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स्नैपचैट की पारखी नजरें 

चित्रयुक्त-चैटिंग के मोबाइल एप्लीकेशन स्नैपचैट के अफसर ने भारत को गरीब क्या कह दिया, बवाल खड़ा हो लिया। राज कपूर साहब के दौर में हीरो गरीब होता था, फिर शाहरुख खान एनआरआई होने लगे, तब से गरीबों की हीरोगिरी खत्म सी हो ली। और अब तो गरीब से गरीब आशिक भी अपनी गर्लफ्रेंड को एप्पल फोन गिफ्ट करने की हसरत रखता है। कई नौजवान तो सिर्फ एप्पल फोन की किस्तों के लिए नौकरी करते हैं, घर-परिवार के हाथ कुछ नहीं आता उनकी सैलरी से।

इस मुल्क में करीब 60 प्रतिशत से ज्यादा भारतीयों के पास टॉयलेट सुविधा नहीं है, लेकिन 80 परसेंट से ज्यादा के पास मोबाइल फोन हैं। गरीबी को मोबाइल से नापें, तो गरीब कोई नहीं। और फिर यहां के औसत बेरोजगार नौजवान को देखें, हर हाल में अपनी गर्लफ्रेंड का मोबाइल रिचार्ज कराने की उनकी प्रतिबद्धता देखें, तो गरीब कोई भी नहीं है। 

अभी दिल्ली के एक व्यस्त चौराहे पर देखा कि फटी-चिथड़ी जीन्स पहने एक भिखारी भीख ले रहा था और फटी-चिथड़ी जीन्स पहने एक नौजवान उसे भीख दे रहा था। फटी-चिथड़ी जीन्स के आधार पर स्नैपचैटी समझ दोनों को ही गरीब घोषित कर सकती है। मगर गरीब कोई नहीं है। एक की जीन्स फैशन है, दूसरे की भीख के धंधे की ड्रेस।
वैसे भारत को कोई भी संवेदनशील व्यक्ति गरीब घोषित कर सकता है, क्योंकि 75 की उम्र के अमिताभ बच्चन सुबह कोई ज्वैलरी बेचते हुए दिखते हैं, शाम को कंपोस्ट खाद और दोपहर में किसी राज्य का टूरिस्ट पैकेज। गरीब मुल्क में ही बुजुर्गों को इतना काम करना पड़ता है। नौजवानों को रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पाना भी गरीबी का लक्षण है। अभिषेक बच्चन को रोजगार-मुक्त देखकर कोई इस मुल्क को गरीब घोषित कर दे, तब भी हमें बुरा नहीं मानना चाहिए। 

यह मुल्क बड़ा वाला गरीब उन बाबाओं की वजह से घोषित नहीं हो पाता, जिनके टर्नओवर अरबों के हैं और जिनकी किरपा के प्रवाह बैंक-खातों के प्रवाह के साथ जुडे़ हुए हैं, थैंक्स बाबाजी ।
आलोक पुराणिक

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