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अखबार बिन, बेचैन एक दिन

अशोक संड First Published:20-03-2017 11:35:28 PMLast Updated:20-03-2017 11:35:28 PM

सिर्फ इतना ही पूछा था कि अखबार नहीं आया क्या? जवाब कुछ ज्यादा ही तेजी से आया- लपकते तो सबसे पहले हैं कि कोई जूठा न कर दे और चाट डालते हैं खबरें। कल छुट्टी थी, ये नहीं सुझाया। पहले पन्ने पर ही तो छपा था...

देवीजी के बाउंसर से झंड हो गई चेतना। जिनका सूर्योदय ही अखबार से होता है, बिन अखबार अंधियारा-सा छाया रहता है। होली-दिवाली बाद अखबार के दफ्तर में पसर जाता है सन्नाटा। उस दिन अखबार की छुट्टी हुई, तो लगा कि जैसे पूरी कायनात आराम फरमा रही है। नि:शब्द है वातावरण। सूना-सूना है जहां... ऐसे में है तू कहां... सरीखा एहसास होने लगता है।

अखबार पढ़ने का भी शऊर होता है। अपनी इस आदत को सार्वजनिक करने में बंदे को रत्ती भर हीन भावना नहीं कि अखबार का पहला पन्ना पूरी तरह पढ़े बिना संपादकीय पेज खोल लेता हूं। पहले पेज की खबरें प्राय: छूट जाती हैं, परिणामत: अलसुबह शृंगार कर दिया देवीजी ने। चाहे कितना अनुभवी और अखबारों का जन्मजात पाठक खुद को कोई क्लेम करे कि आजकल खबरों से दृष्टिकोण नहीं बनते, बल्कि खबरों के प्रति अपना दृष्टिकोण निरंतर बदलना पड़ता है। कांग्रेस टाइटैनिक की याद दिला रही है। साइकिल पंक्चर हो गई है या गायत्री जाप हो रहा है या गायत्री प्रजापति गिरफ्त में आए, इनसे ज्ञान वर्धन होने से रहा, ऐसी सूचनाएं तो सारे दिन टीवी चैनलों पर म्युनिस्पैलिटी के खुले नल की तरह बहती रहती हैं। सोना उछले या चांदी लुढ़के, उससे उस जीव को क्या वास्ता, जो दिवाली और अक्षय तृतीया पर भी सर्राफा बाजार की तरफ गर्दन नहीं घुमाता? एक क्लास ऐसा भी है, जो खबरों को कमोड पर बैठकर ही उदरस्थ करता है।

एडिट पेज पर इतना तय कि करेंट इशू पर विद्वानों की राय होगी। ज्ञान-ध्यान की बातें भी उसी पेज में संजोई जाती हैं। बड़े फायदे हैं अखबार के। अखबार न हो, तो कौम की रहनुमाई कैसे हो? यह जनाब इब्ने इंशा ने उर्दू की आखिरी किताब में भी लिखा है।

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