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बस गुल्लकें ही टूट रही हैं

जी, अब ताले नहीं टूट रहे। लगता है कि थोड़ा-थोड़ा सा रामराज्य आ गया है। पड़ोसी अपना धर्म निभाने लगे हैं, यार यारी करने लगे हैं और चोर चोरी नहीं कर रहे। अलबत्ता हेराफेरी अब भी करते होंगे। पहले ताले टूटते थे, तिजोरियां टूटती थीं, चोर एटीएम मशीन तक को तोड़ डालते थे। ताले ही नहीं, मर्यादाएं भी टूटती थीं। कानून-व्यवस्था तो ऐसे टूटती थी कि उसके परखच्चे उड़ जाते थे। पर अब न ताले टूट रहे हैं, न कानून टूट रहा है। लोग वैसे ही लुट गए। लूटने का इल्जाम कभी चोर-डकैतों पर जाता था। अब यह कोई नहीं कह रहा कि सरकार ने लूट लिया।  

अब गुल्लकें टूट रही हैं। पहले गुल्लकें भरी जाती थीं, अब तोड़ी जा रही हैं। कभी बच्चे, मां-बाप से पैसा मांगते थे। अब मां-बाप बच्चों से पैसा मांगते हैं। पहले बचत की सीख दी जाती थी, अब बचत को खर्च किया जा रहा है। उसी से सब्जी का आ रही है, दूध आ रहा है। परंपराएं टूट रही हैं, पर कहीं पर धारा 144 नहीं टूट रही। देख लीजिए, लोग कानून के कितने पाबंद हो गए हैं। कभी धारा 144 को तोड़ना क्रांतिकारी कदम माना जाता था, जो उतना क्रांतिकारी वास्तव में था नहीं। क्योंकि जलसे-जुलूस करने वाले सभी इसे तोड़ लेते थे। वे तो पुलिस के बैरिकेड भी तोड़ लेते थे। हां, कभी-कभी ज्यादा हो जाता था, तो फिर पुलिस लोगों को तोड़ती थी। इसी क्रांतिकारिता में लोग समाज की बंदिश तक तोड़ डालते थे। 

फिर धीरे-धीरे तोड़ना एक तरह का राष्ट्रीय शगल हो गया। लोग सरकारें तोड़ने लगे। कोई-कोई तो और कुछ नहीं मिला, तो धार्मिक स्थल ही तोड़ने लगा। आपस का भाईचारा और लोगों की एकता टूटने लगी। खतरा यहां तक बढ़ गया कि कहीं देश ही न टूट जाए। पर अब कोई खतरा नहीं। अब तो बैंकों के सामने लगी लाइनें तक नहीं टूट रहीं, वरना इतनी भीड़ में तो लोगों के सिर फूट जाएं और हाथ-पांव तो अवश्य ही टूट जाएं। पर अब तो लोगों का धैर्य तक नहीं टूट रहा। अब बस गुल्लकें टूट रही हैं, क्योंकि तिजोरियों में कुछ बचा नहीं और ताले किसी काम के नहीं रहे।

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  • Web Title:just broken piggy bank