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प्रजातंत्र के पहरुओं का विकास

First Published:20-03-2017 12:28:51 AMLast Updated:20-03-2017 12:28:51 AM

पहरुए छायावादी शब्द है। यूं तो रखवारे का भी अर्थ वही है, पर पहरुए की बात ही कुछ और है। इसे सुनो, तो कान में जैसे घुंघरू बजें। कथकली जैसे चेहरे लगाए लोकतंत्र में पहरुआ ज्यों कथक का चंचल-चपल घेरा है। पता नहीं, भूखे, अभावग्रस्त को आए न आए, समृद्ध जब भी पहरुए को बोले-सुने, तो उसे किसी मनभावन पकवान का स्वाद आए। हिंदी साहित्य ने भले छायावाद से आगे का सफर तय कर लिया है, पर भारतीय प्रजातंत्र अब भी पहरुआ युग में है।


जनसेवक आज भी मोहक, प्रेरक, आकर्षक, लुभाऊ आदि शब्दों से जनता को उल्लू बनाने में जुटे हैं। कोई जातिगत जुड़ाव पर सामाजिक न्याय, समता, समानता और सेक्युलरिज्म का मुलम्मा चढ़ाकर, तो कोई राजा-स्टाइल में अपनी ‘परजा’ को इनायत की बख्शीश बांटने का वादा दोहराकर। उन्हें डर है कि गरीबी ‘हटो-हटो’ की गुहार से तंग आकर कहीं वाकई हटी, तो उनकी बख्शीश, सेवा का क्या होगा? यही तो उनकी जनसेवा है। समझदार पुरखों ने गरीबी हटाने की सार्वजनिक हुंकार भरी तो जरूर, पर उसे बढ़ाने के हरसंभव प्रयास में वे आकंठ डूबे। यह उनकी सफलता के अलावा क्या है कि कोई देश की प्रगति का जिक्र भी करे, तो दूसरा उसे भ्रष्टाचार की तरक्की समझे?

छायावादी छल में जनता को फंसाए रखने का एक अन्य दिलकश लफ्ज- विकास ईजाद किया गया है। इसका जाल विस्तृत, विशाल और विश्वव्यापी है। इसमें देशी रुपये और विदेशी डॉलर के गिद्ध खुद-ब-खुद आ टपकते हैं, इसे ले उड़ने के आत्मविश्वास से लबरेज। विकास कर्णप्रिय, लोकप्रिय और लुभावना शब्द है। आम आदमी सुने, तो उसे मुगालता हो कि इसमें बैठे-ठाले उसके जीवन में सुधार की संभावनाएं हैं। सच भी है। विकास का लूट-रथ प्रगति पथ पर अग्रसर है। कहीं छिटपुट मरम्मत से रोजगार देकर, तो कहीं पुरानी को खुदवाकर और नई सड़क बनवाकर। कुछ ने भ्रष्टाचार की नदी पर वसूली का शानदार पुल बनवाया है। जाहिर है, इन्हें जमीनी विकास की बात करने वाला देश का साक्षात् दुश्मन लगे।
गोपाल चतुर्वेदी

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