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खत्म होती जगहें

हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि शहर फैल रहे हैं और जगहें सिकुड़ रही हैं; शहरों का विस्तार ज्यादातर गांवों-कस्बों की जगहें हड़पकर हो रहा है। जब रहने की जगहें, मकान तेजी से दुकानों में बदले जा रहे हैं, तब खुली और निडर, आत्मीय और सामुदायिक जगहों का टोटा लाजिमी है। जो जगहें सौभाग्यवश या असावधानी के कारण बची हैं, उनमें तरह-तरह की बंदिशें आयद हो रही हैं। प्रेम, संग साथ, मित्रता, अंतरंग चर्चा आदि के लिए एकांत समाप्त हो रहे हैं। उन पर नजर रखी जा रही है और जब-तब लोगों को अकेले-दुकेले पाकर धर पकड़ा या दबोचा या धमकाया-पीटा जा रहा है। शहरों में बेजा कब्जा आम बात है; वह हमेशा माफिया या बाहुबलियों द्वारा ही नहीं किया जाता, उसमें सत्ताधारी और धन-दौलतवाले पूरी बेशर्मी से शामिल होते हैं। राजनीति और धर्म दोनों एक-दूसरे की जगह बिना किसी लाज-शरम के हड़प रहे हैं। इस गड्ड-मड्ड के चलते धर्म से अध्यात्म गायब हो चुका है और उसकी जगह कर्मकांड ने ले ली है। राजनीति से मूल्य गायब हो गए हैं और उनकी जगह पाखंड और कथनी-करनी का भयावह अंतर घर कर गए हैं। इस लूटपाट में साहित्य और कलाएं ही वे जगहें हैं, जहां मनुष्य का मनुष्य होना पर्याप्त है। विडंबना यह है कि स्वयं साहित्य और कलाओं की जगहें भी घट रही हैं; उन पर प्रहार हो रहे हैं।
सत्याग्रह में अशोक वाजपेयी


 

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