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खुशदिल मदान

पता चला कि बृजेश्वर मदान नहीं रहे। हमारी पहली मुलाकात 10, दरियागंज में हुई थी। तब 10 दरियागंज टाइम्स का दफ्तर था, जहां से दिनमान, पराग  निकलते थे। मदान से हमें सारिका  के उप-संपादक रमेश बत्रा ने मिलवाया था और हम दोस्त हो गए। मदान किसी भी विषय पर लिखने की महारत रखते रहे, बशर्ते भुगतान ठीक-ठाक हो।

उनकी सांझ प्रेस क्लब से शुरू होती और पुलिस के सरकारी वाहन से घर तक जाती। उन दिनों पुलिस को यह शख्त हिदायत थी कि सांझ को प्रेस क्लब की निगरानी रखी जाए और जो पत्रकार ढीले होकर निकलें, उनके वाहन को नजदीकी थाने में जमा कराकर उनको उनके घर तक बाकायदा पहुंचाया जाए। मदान ने सरकार के इस अलिखित कानून का पालन शुरू कर दिया। रात की घटना का बखान वह संजीदगी से करते।

खुशदिल, ठहाकेबाज। हुनर तो कमाल का। बाज दफे फिल्म देखी भी नहीं और रिव्यू लिख दिया- बकवास स्क्रिप्ट, बेहतर फिल्म। जो लिख देते, वह सही साबित होता। हमने पूछा, कैसे यह लिख देते हो? ‘तुम भी यार! डायरेक्टर को नहीं जानते?’ और फिर उसकी जितनी भी फिल्में होतीं, गिना जाते ‘यह भी उसी तर्ज पर होगी। सब बासू (बासु भट्टाचार्या) थोड़े ही हो जाएंगे।’ मगर अपनी स्क्रीप्ट बीच में ही छोड़कर चले गए... उनके चाहने वालों को यह सालता रहेगा। 
चंचल की फेसबुक वॉल से

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