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टूटता सपना अपने घर का

रोटी, कपड़ा और मकान बुनियादी जरूरतें हैं, लेकिन धरती के भीतर-बाहर अपार संपदा होने के बावजूद दुनिया के अनेक हिस्सों में बहुत से लोगों को न भरपेट रोटी मिल पाती है, न पहनने के लिए सही कपडे़ और न ही रहने के लिए एक घर। बढ़ते शहरीकरण, वित्तीय अनिश्चितता और अटकलबाजी की वजह से पूरी दुनिया में समुचित संख्या में मकान उपलब्ध न होने का संकट बढ़ता जा रहा है। सबके लिए उपयुक्त घर या मकान के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत लीलानी फरहा ने मौजूदा हालात के लिए वित्तीय बाजारों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि दुनिया भर में ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा करने की लालसा और लालच की वजह से बहुत से लोग शहरों में अपने रहने के लिए उपयुक्त घर या मकान खरीदने से वंचित होते जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून और टिकाऊ विकास लक्ष्यों के एजेंडे में यह व्यवस्था है कि हर इंसान को एक घर हासिल करने का अधिकार है। मगर मौजूदा हालात एक दर्दनाक कहानी कहते हैं। फरहा के मुताबिक, दुनिया भर में मकान बाजार की कीमत करीब 163 ट्रिलियन आंकी गई है, जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की दोगुनी राशि है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि घर या मकान को इंसान की बुनियादी जरूरत की बजाय एक उपभोक्ता वस्तु समझा जाने लगा है।

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  • Web Title: breaks your dream home