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खास नहीं, आम के लिए भी है राष्ट्रपति भवन
First Published:30-06-12 11:31 PM
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शरद भट्टातिरिपद, एफएम रेडियो ‘फीवर 104’ से जुड़े हैं

एक आइडिया, जो अजीब हो सकता है लेकिन बकवास नहीं। आइडिया, राष्ट्रपति चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने का। पिछले सोमवार, 25 जून को अनायास राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का ख्याल मेरे मन में आते ही दिमाग की बत्ती जल गई।

एफएम रेडियो फीवर के दफ्तर में अपने खुराफाती साथी जॉकी नितिन के साथ यह आइडिया साझा करने से पहले मुझे इस बात का कतई अहसास नहीं था कि चंद मिनट बाद ही मेरे साथ साड्डी दिल्ली जुड़ने वाली है। आखिर, राष्ट्रपति बनना भले ही किस्मत की बात हो, लेकिन इस रेस में शामिल होने के लिए प्रयास करने की जरूरत है।

मैंने तुरंत राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचन अधिकारी वीके अग्निहोत्री से संपर्क किया। उन्होंने नामांकन के  लिए जरूरी चार योग्यताएं बताई। इनमें 35 वर्ष उम्र, पंद्रह हजार रुपये की जमानत राशि, अपने संसदीय क्षेत्र से निर्वाचन प्रमाण-पत्र और प्रस्तावक-समर्थक के तौर पर 100 सांसदों-विधायकों का अनुमोदन शामिल है। उम्र और जमानत राशि तो पूरी हो गई, लेकिन निर्वाचन प्रमाण-पत्र और सांसदों-विधायकों का अनुमोदन जुटाना बड़ी चुनौती थी। श्रोताओं की मदद से यह काम भी हो गया। एक ही दिन में गृह जनपद भोपाल से निर्वाचन प्रमाण-पत्र मिल गया और तीन दिन की मशक्कत के बाद 100 सांसदों-विधायकों का अनुमोदन भी मिल गया। तमाम श्रोताओं ने अपनी पहचान वाले सांसदों-विधायकों से संपर्क कर यह काम भी मुकम्मल करा दिया।

नामांकन की अंतिम तिथि 30 जून से एक दिन पहले ही शुक्रवार को मैंने नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। मुझे पता है कि मैं राष्ट्रपति चुनाव में जीत नहीं पाऊंगा। लेकिन, इस कवायद के सिर्फ दो ही मकसद रहे। एक तो मीडिया के माध्यम से जनता को गणतंत्र का सही मतलब बताना और दूसरा, लोगों को उनके इस अधिकार से अवगत कराना कि आम आदमी भी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ सकता है।
निर्मल यादव से बातचीत पर आधारित

 
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