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Image Loading अन्य फोटो हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत मोहनजोदड़ो सं मिली कांस्य नर्तकी की एक फाइल फोटो।
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सिंधु सभ्यता ने किया दक्षिण का रुख, केरल में अवशेष
कोझिकोड, एजेंसी
First Published:29-09-09 12:48 PM
Last Updated:29-09-09 02:44 PM
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पुरातत्ववेत्ताओं को केरल में सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इस ऐतिहासिक खोज से सिंधु सभ्यता के विस्तार का अखिल भारतीय स्वरूप स्थापित हो सकता है। अब तक दक्षिण में दायमाबाद (महाराष्ट्र) तक ही इसके प्रमाण मिले थे।

अब तक के प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों में सिंधु सभ्यता का विस्तार पूर्व में आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) पश्चिम में सुतकागेंडोर ( सिंध), उत्तर में माडा ( जम्मू-कश्मीर) और दक्षिण में दायमाबाद ( महाराष्ट्र) माना जाता रहा है। लेकिन इस खोज से यह साबित हो जाएगा कि सिंधु सभ्यता पूरे भारत में फला-फूला। इससे उस विचारधारा को भी और अधिक बल मिलेगा जिसमें कहा जाता है कि सिंधु सभ्यता स्थानीय सभ्यताओं का ही एक क्रमिक विकास था।

केरल के वयानड जिले की एडक्कल गुफाओं में चट्टान पर उकेरी गईं आकृतियों से हड़प्पा संस्कृति के स्पष्ट संकेत मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के दक्षिण भारत से संबंध था ।

इतिहासकार एमआर राघव वेरियर का कहना है कि कर्नाटक और तमलिनाडु में सिंधु घाटी सभ्यता के संकेत मिलते रहे हैं, लेकिन नई खोज से पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता इस क्षेत्र में भी मौजूद थी। इससे लौह युग के पूर्व के केरल के इतिहास का पता चल सकता है।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो क्षेत्रों में पाई गई पाकिस्तान तक फैली सिंधु घाटी सभ्यता के अदभुत प्रतीक राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई के दौरान हाल ही में गुफाओं में पाए गए। उत्खनन कार्य का नेतृत्व करने वाले वेरियर ने बताया कि इस दौरान 429 चीजों की पहचान की गई, जिनमें से एक में एक व्यक्ति जार कप के साथ दिखाई देता है जो सिंधु घाटी सभ्यता का अदभुत प्रतीक है। कुछ अक्षर भी मिले जो 2300 से 1700 ईसा पूर्व दक्षिण भारत में फैली हड़प्पा संस्कृति के प्रतीक चिन्ह हैं।


वेरियर ने कहा कि जार के साथ आदमी की आकृति उन क्षेत्रों में अक्सर पायी जाती रही है जहां कभी सिंधु घाटी सभ्यता मौजूद थी। उन्होंने कहा कि एडक्कल में किए गए उत्खनन में अलग शैली अपनाई गई, क्योंकि इसमें द्विआयामी मानव आकृति को खोजने की कोशिश की गई।

वेरियर ने कहा कि एडक्कल गुफाओं में पाए गए प्रतीक और चित्रों को पहली बार 1901 में तत्कालीन मालाबार जिले के पुलिस अधिकारी फॉसेट ने अध्ययन का विषय बनाया था। बाद में वेरियर ने जाने माने इतिहास विद्वान राजन गुरुक्कल के साथ अध्ययन को आगे बढ़ाया।

 
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