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मां को गुजारा भत्ता न देने पर कोर्ट की फटकार
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:04-06-12 05:26 PM
दिल्ली की एक अदालत ने बूढ़ी और बीमार मां को गुजारा भत्ता देने में ना नुकुर करने पर एक व्यक्ति को फटकार लगाई है। अदालत ने इस व्यक्ति के रुख को अमानवीय और शर्मनाक करार देते हुए कहा है कि वह उस महिला के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने में विफल रहा, जिसने उसे जन्म दिया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सविता राव ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें उसे अपनी मां को प्रति माह 800 रुपये देने को कहा गया था। अदालत ने इस दौरान सिविल लाइन्स निवासी उस व्यक्ति की खिंचाई की।
अदालत ने कहा कि वह (व्यक्ति) उस महिला के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझता है जिसने उसे जन्म दिया क्योंकि वह अपनी आय में से अपनी मां को कोई हिस्सा नहीं देना चाहता। अदालत ने कहा कि उसने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत दायर याचिका के तहत यहां तक आरोप लगा दिया कि गुजारा भत्ता के लिए उसकी मां उससे धन की वसूली करना चाहती है। यह मानव जीवन के सर्वाधिक पूजनीय रिश्ते के प्रति उसके अमानवीय और शर्मनाक रवैये को दर्शाता है।
यह आदेश उस व्यक्ति की याचिका पर आया जिसने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी थी। मजिस्ट्रेट अदालत ने उसे तथा उसके भाई को अपनी मां को प्रति माह गुजारा भत्ता के तौर पर 800-800 रुपये देने का आदेश दिया था।
ठेका मजदूरी करने वाले इस व्यक्ति ने मां को गुजारा भत्ता देने से इंकार करते हुए दलील दी थी कि उसे अपनी पत्नी और तीन बच्चों की परवरिश करनी है। इनमें से एक लड़की विवाह योग्य है जबकि उसकी पत्नी कई बीमारियों से पीड़ित है।
अदालत ने उसकी इस दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह घृणित है। अदालत ने कहा कि भले ही उस पर पत्नी और तीन बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी हो लेकिन वह अपनी मां की देखभाल करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
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