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किशोर अधिनियम में बदलाव, केंद्र सरकार को नोटिस
नई दिल्ली, एजेंसी First Published:09-01-2013 03:09:40 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार और हत्या जैसे अपराध करने वाले 16 वर्ष से अधिक के किशोरों को किशोर न्याय अधिनियम से बाहर रखे जाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बुधवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश डी. मुरुगेसन और न्यायमूर्ति वी.के. जैन की खण्डपीठ ने केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्रालय और केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय के जरिए सरकार को नोटिस जारी किया और 14 फरवरी तक जवाब सौंपने के लिए कहा।

याचिका में कुछ प्रावधानों को किशोर न्याय अधिनियम से बाहर रखने का अनुरोध करते हुए आरोप लगाया गया है कि हाल के दिनों में हुई कुछ घटनाओं से जाहिर होता है कि 16 वर्ष तक की उम्र के किशोर 'गम्भीर अपराधों' में संलिप्त रहे हैं और वे 'पूर्ण विकसित' हैं।

याचिका में कहा गया है कि उन्हें समाज के संरक्षण व देखभाल की जरूरत नहीं है, बल्कि समाज को उनसे संरक्षण एवं देखभाल की जरूरत है।

अधिवक्ता आर. के. कपूर ने कहा कि यदि 16 वर्ष से अधिक के किशोर दुष्कर्म एवं हत्या जैसे 'जघन्य अपराध' में शामिल हैं तो उन्हें किशोर नहीं समझा जाना चाहिए और कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि 16 वर्ष से अधिक के किशोरों को 'आजीवन कारावास' तथा 'मृत्युदंड' से बचने नहीं दिया जाना चाहिए।

यह जनहित याचिकाकर्ता उच्चतम न्यायालय की वकील श्वेता कपूर ने दायर की है। उनके वकील ने कहा कि धारा 16 सहित कानून के विभिन्न प्रावधानों की समीक्षा की जरूरत है क्योंकि यह 16 वर्ष से कम आयु के अपराधियों को उम्र कैद और मृत्यु दंड देने में पाबंदी लगाते हैं।
    
याचिका में कानून के विभिन्न प्रावधानों की परस्पर विरोधी बातों पर भी ध्यान आकर्षित किया गया है, जिनके तहत एक नाबालिग अधिकारी को वयस्क होने पर सुधार गृह से जाने की अनुमति देने का प्रावधान है।
    
कानून में कहा गया है कि 16 वर्ष से अधिक आयु वाले बाल अपराधियों को अन्य बच्चों से अलग रखा जाये और उनकी हिरासत की अवधि तीन साल की होगी, जबकि उसी कानून के एक अन्य प्रावधान में कहा गया है कि एक नाबालिग अधिकारी सुधार गह में केवल तभी रखा जा सकता है जब तक वह वयस्क होने की 18 साल का न हो जाये।
    
याचिका में कहा गया है, दूसरे शब्दों में धारा 16 एक अलग तरह के किशोर की परिकल्पना करता है, जिन्होंने गंभीर किस्म के अपराध किये हों और उन्हें सुधार गृहों में नहीं रखा जा सकता। ऐसे में कानून की धारा 16 (प्रथम भाग) की उपधारा एक परस्पर विरोधी है।
   
यह याचिका दिल्ली में गत 16 दिसंबर को एक बस में एक 23 वर्षीय युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के परिप्रेक्ष्य में काफी महत्वपूर्ण हो गई है, जिसमें जांच से पता चला है कि नाबालिग अपराधी ने ही सबसे अधिक क्रूरता की थी।
    
याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले में नाबालिग आरोपी की आयु घटना के समय साढे सत्रह वर्ष है और अगर उस पर आरोप सिद्ध हुआ तो बालिग होने की आयु प्राप्त करते ही वह सुधार गृह से बाहर आ जायेगा। उसे न तो बाल अपराधियों के साथ सुधार गृह में रखा जा सकेगा और वह न ही वयस्क अपराधियों के साथ जेल में रहेगा।
   
याचिका यह सर्वविदित तथ्य है कि 16 से 18 वर्ष तक की आयु के अनेक किशोरों ने जघन्य अपराध और नृशंस हत्यायें की हैं, लेकिन कानून के कुछ प्रावधान उनके मामले के देश के संविधान की भावना के विपरीत हैं, क्योंकि इसमें असमान लोगों को एक साथ जोड दिया गया है और उन्हें एक जैसा ही लाभ दिया गया है, जबकि 16 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के उन किशोरों को यह लाभ नहीं दिया जा सकता जिन्हें जघन्य और गंभीर मामलों में लिप्त पाये जाते हैं।
    
याचिका में कहा गया है कि एक व्यक्ति यदि 17 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद गंभीर अपराध करता है तो 364 दिन के लिये उसके साथ उसी अपराध के लिये ऐसे व्यक्ति से अलग बर्ताव नहीं किया जा सकता जो 18 साल और एक दिन की आयु पूरी करने वाले व्यक्ति ने किया हो।

 
 
 
 
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