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संसद हमले के साजिशकर्ता को मौत का खौफ नहीं
नई दिल्ली, एजेंसी First Published:09-12-2012 08:43:57 PMLast Updated:09-12-2012 09:58:51 PM
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देश में अभेद्य दुर्ग मानी जाने वाली जेलों में से एक तिहाड़ जेल में 11 वर्षों से 16 गुणा 12 की एक कोठरी में बंद व्यक्ति को फांसी का भी खौफ नहीं है। यह कोई और नहीं 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए आतंकवादी हमले का मुख्य साजिशकर्ता अफजल गुरु है। अफजल को इस बात खौफ नहीं है कि उसे भी किसी दिन 26/11 में दोषी ठहराए गए अजमल अमिर कसाब की तरह फांसी दी जा सकती है।

तिहाड़ जेल के प्रवक्ता सुनील गुप्ता ने बताया कि कसाब को 21 नवम्बर को भले ही फांसी दे दी गई, लेकिन अफजल पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिख रहा। उन्होंने कहा कि अफजल गुरु तिहाड़ जेल तीन नम्बर वाली कोठरी में बंद है। अभी तक उसने मौत को लेकर कोई भावना नहीं व्यक्त की है। असल में फांसी का तख्ता उसकी कोठरी से महज 15 से 20 मीटर की दूरी पर है।

अफजल गुरु अपना समय दूसरे कैदियों की ही तरह गुजारता है। उसकी कोठरी की सुरक्षा में तमिलनाडु विशेष पुलिस, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के करीब 50 सशस्त्र जवानों को तैनात किया गया है। 13 दिसम्बर 2001 को पांच पाकिस्तानी आतंकवादियों ने संसद पर हमला किया था। जवाबी कार्रवाई में सभी मारे गए थे। इस मामले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु सहित तीन लोग फरार हो गए थे। 14 और 15 दिसम्बर को दिल्ली पुलिस के विशेष दस्ते के साथ जांच एजेंसी ने चार लोगों को आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) के तहत गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार किए गए लोगों में अफजल के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी, नवजोत उर्फ अफसां और उसके पति शौकत हुसैन गुरु शामिल थे।

गिलानी और अफसां बरी कर दिए गए और शौकत गुरु की सजा घटा कर 10 वर्ष के कारावास में बदल दी गई और अब वह जेल से बाहर है। अफजल गुरु को 18 दिसम्बर 2002 को फांसी की सजा सुनाई गई, जिस पर 29 अक्टूबर 2003 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुहर लगा दी। 4 अगस्त 2005 को सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी अपील ठुकरा दी। उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और उदार बुद्धिजीवियों का तर्क है कि उसे फांसी नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि वह अपराध के समय घटना स्थल पर मौजूद नहीं था। उसके खिलाफ सभी साक्ष्य परिस्थितिजन्य हैं। उम्र के 40वें साल में चल रहे अफजल गुरु का ज्यादा समय किताबों के साथ गुजरता है। एक अधिकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि उसके पास एक रेडियो है, जिस पर केवल दो स्टेशनों के प्रसारण सुने जा सकते हैं। वह कभी-कभी संगीत सुनता है, लेकिन किसी से ज्यादा बात नहीं करता। उससे बात करने के लिए जेल के बड़े अधिकारियों को भी डीजी स्तर के अधिकारी से अनुमति लेनी पड़ती है।

वह सुबह 5 से 6 के बीच जग जाता है और नमाज के साथ उसकी दिनचर्या शुरू होती है। सुबह 9 बजे नाश्ते में उसे ब्रेड, चाय और आलू दिया जाता है। भोजन में दाल, सब्जी और चपाती दी जाती है। रात में भी उसे यही खाना मिलता है। अन्य कैदियों की तरह वह भी रात 9 बजे से 10 बजे के बीच सो जाता है।

 
 
 
 
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