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बंदूक से खेती तक, कश्मीर में उग्रवादी की घर वापसी
शोपियां, एजेंसी
First Published:04-05-12 06:13 PM
वे अल्लाह का शुक्रिया अदा करें या सरकार का? कश्मीर घाटी की संघर्षरत राजनीति में यह बड़ा सवाल है, लेकिन शोपियां जिले के नारपोरा गांव में डार समुदाय के लोग तहेदिल से दोनों को धन्यवाद दे रहे हैं, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादियों के साथ 11 साल बिताने के बाद उनका बेटा घर लौट आया है। बेटे की घर वापसी उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं है।
अब्दुल गनी (65) और उनकी पत्नी सारा (60) पिछले 11 साल से अपने बेटे को लेकर अनिश्चितता के माहौल में जी रहे थे, जो वर्ष 1991 में नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर चला गया था। उसके साथ ही उनकी खुशियां भी चली गई थी, लेकिन अब बेटे की वापसी के बाद उन्हें उम्मीद है कि जीवन की खुशियां भी लौट आएंगी।
नारपोरा गांव के ये दम्पत्ति अल्लाह के साथ-साथ मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सरकार की पुनर्वास नीति के प्रति भी आभार व्यक्त करते हैं, जिसकी वजह से बेटे की घर वापसी सुनिश्चित हो पाई।
तीन बेटों और छह बेटियों के पिता अब्दुल गनी ने कहा कि हमने सभी उम्मीदें खो दी थीं। यह 11 साल बाद बेटे के पुनर्जन्म जैसा है। हम पिछले 11 साल से डर के माहौल में जी रहे थे।
जम्मू एवं कश्मीर सरकार की पुनर्वास नीति उन युवकों की सम्मानजनक घर वापसी सुनिश्चित करने के लिए है, जिन्होंने पिछले 20 साल में हथियार हासिल करने के लिए नियंत्रण रेखा लांघी। अब्दुल राशिद डार भी उन्हीं में से एक हैं।
वह केवल 25 वर्ष का था, जब अलगवादी लड़ाकों के साथ जुड़ने के लिए उसने नियंत्रण रेखा लांघी थी। राशिद ने बताया कि नवम्बर 2०1० में घोषित सरकार की पुनर्वास नीति के बाद वह अपनी पाकिस्तानी पत्नी सबीना के साथ लौट आया।
राशिद ने यह बताने से इंकार कर दिया कि घाटी में लौटने के लिए उसने क्या रास्ता अपनाया। घर से इतने वर्ष दूर रहने के दौरान बिताए गए वक्त के बारे में भी उसने कुछ नहीं बताया। आईएएनएस से बातचीत में उसने केवल इतना कहा, ''राज्य सरकार को यह नीति जारी रखनी चाहिए, ताकि ऐसे युवाओं को लाभ हो सके, जो वापसी करना चाहते हैं।''
राशिद की पत्नी सबीना, जो पाकिस्तान के 'फ्रंटियर पोस्ट' समाचार पत्र के साथ काम चुकी है, ने पति के साथ लोगों से शांति की अपील करते हुए कहा कि इसका कोई विकल्प नहीं है।
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