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असंवैधानिक नीतियों को निरस्त कर सकती है कोर्ट: गांगुली
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:06-02-12 03:25 PM
Last Updated:06-02-12 03:34 PM
2जी स्पेक्ट्रम मामले में 122 लाइसेंसों को रदद करने के शीर्ष अदालत के फैसले को न्यायिक अधिकारों से परे बताने संबंधी आलोचना को दरकिनार करते हुए न्यायमूर्ति एके गांगुली ने सोमवार को कहा कि अदालतें उन नीतिगत फैसलों की निश्चित रूप से जांच पड़ताल कर सकती हैं और उन्हें रद्द कर सकती हैं, जो असंवैधानिक हैं।
न्यायमूर्ति गांगुली शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय पीठ में शामिल थे जिसने 2जी स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंसों को हाल ही में रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान के तहत न्यायिक समीक्षा इसका एक बुनियादी लक्षण है और इस तरह की न्यायिक समीक्षा करते हुए अदालत कार्यपालिका के उन नीतिगत फैसलों की निश्चित रूप से पड़ताल कर सकती हैं और उन्हें निरस्त कर सकती हैं जो असंवैधानिक हैं।
गत गुरुवार को ही सेवानिवृत्त हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और जानेमाने वकील सोमनाथ चटर्जी की टिप्पणी पर यह प्रतिक्रिया दी। चटर्जी ने कहा था कि अदालतें कार्यपालिका की नीतियों और फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं भले ही उनमें व्यापक जनहित की बात हो।
न्यायमूर्ति गांगुली ने कोलकाता के एक अखबार में प्रकाशित अपने लेख में कहा, चटर्जी का यह बयान वाकई चौंकाने वाला है कि अदालत व्यापक जनहित में भी कार्यपालिका की नीतियों और फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं और ऐसा करके अदालत खुद को संविधान से उपर मानती हैं।
न्यायमूर्ति गांगुली ने लिखा है कि किसी निर्णय की आलोचना का अधिकार एक तरह से संविधान के तहत प्रदत्त बोलने की स्वतंत्रता का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कई बार आलोचना का आधार रोचक हो जाता है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी द्वारा 2जी मामले में फैसले की आलोचना भी उतनी ही रोचक है।
चटर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि पीठ की ओर से वह पूर्व लोकसभा अध्यक्ष को विश्वास दिला सकते हैं कि यह फैसला कार्यपालिका के अधिकारों को प्रभावित करने की कामना से नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा कि अदालत ने फैसला देते हुए स्पष्ट रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाई। संविधान के तहत अदालत का यह सबसे सामान्य काम है और इस तरह की जिम्मेदारियां निभाते हुए अदालत संविधान से उपर नहीं बल्कि उसके अनुरूप काम करती है।
1970 के दशक में हड़ताल पर गये अनेक कर्मचारियों को निकालने के रेलवे प्रशासन के कुछ फैसलों को याद करते हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने लिखा है कि सोमनाथ चटर्जी ने कर्मचारियों की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय में उन फैसलों को चुनौती दी थी।
उन्होंने लिखा कि कनिष्ठ वकील के रूप में मैंने भी अन्य विद्वान वकीलों के साथ उस समय सहायता की। मुक्षे विश्वास है कि चटर्जी को याद होगा कि अदालत ने हस्तक्षेप किया था और नीतिगत फैसलों के रूप में दिये गये कार्यपालिका के अनेक आदेशों को उलट दिया गया और कर्मचारी फिर से नौकरियों पर लौट गये।
न्यायमूर्ति गांगुली ने यह भी लिखा है कि तब दिल्ली में भारतीय बार संघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में चटर्जी ने सार्वजनिक रूप से कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायिक हस्तक्षेप की तारीफ की थी।
उन्होंने कहा कि आप अदालतों के आदेशों की आलोचना करने के लिए संभवत: दोहरे मानदंड नहीं अपना सकते। चटर्जी की कानूनी समझ के प्रति मेरे परम सम्मान के मद्देनजर 2जी मामले में उनके आलोचना को लेकर गढ़े गये तर्क से मैं थोड़ा निराश हूं।
न्यायमूर्ति गांगुली शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय पीठ में शामिल थे जिसने 2जी स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंसों को हाल ही में रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान के तहत न्यायिक समीक्षा इसका एक बुनियादी लक्षण है और इस तरह की न्यायिक समीक्षा करते हुए अदालत कार्यपालिका के उन नीतिगत फैसलों की निश्चित रूप से पड़ताल कर सकती हैं और उन्हें निरस्त कर सकती हैं जो असंवैधानिक हैं।
गत गुरुवार को ही सेवानिवृत्त हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और जानेमाने वकील सोमनाथ चटर्जी की टिप्पणी पर यह प्रतिक्रिया दी। चटर्जी ने कहा था कि अदालतें कार्यपालिका की नीतियों और फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं भले ही उनमें व्यापक जनहित की बात हो।
न्यायमूर्ति गांगुली ने कोलकाता के एक अखबार में प्रकाशित अपने लेख में कहा, चटर्जी का यह बयान वाकई चौंकाने वाला है कि अदालत व्यापक जनहित में भी कार्यपालिका की नीतियों और फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं और ऐसा करके अदालत खुद को संविधान से उपर मानती हैं।
न्यायमूर्ति गांगुली ने लिखा है कि किसी निर्णय की आलोचना का अधिकार एक तरह से संविधान के तहत प्रदत्त बोलने की स्वतंत्रता का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कई बार आलोचना का आधार रोचक हो जाता है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी द्वारा 2जी मामले में फैसले की आलोचना भी उतनी ही रोचक है।
चटर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि पीठ की ओर से वह पूर्व लोकसभा अध्यक्ष को विश्वास दिला सकते हैं कि यह फैसला कार्यपालिका के अधिकारों को प्रभावित करने की कामना से नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा कि अदालत ने फैसला देते हुए स्पष्ट रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाई। संविधान के तहत अदालत का यह सबसे सामान्य काम है और इस तरह की जिम्मेदारियां निभाते हुए अदालत संविधान से उपर नहीं बल्कि उसके अनुरूप काम करती है।
1970 के दशक में हड़ताल पर गये अनेक कर्मचारियों को निकालने के रेलवे प्रशासन के कुछ फैसलों को याद करते हुए न्यायमूर्ति गांगुली ने लिखा है कि सोमनाथ चटर्जी ने कर्मचारियों की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय में उन फैसलों को चुनौती दी थी।
उन्होंने लिखा कि कनिष्ठ वकील के रूप में मैंने भी अन्य विद्वान वकीलों के साथ उस समय सहायता की। मुक्षे विश्वास है कि चटर्जी को याद होगा कि अदालत ने हस्तक्षेप किया था और नीतिगत फैसलों के रूप में दिये गये कार्यपालिका के अनेक आदेशों को उलट दिया गया और कर्मचारी फिर से नौकरियों पर लौट गये।
न्यायमूर्ति गांगुली ने यह भी लिखा है कि तब दिल्ली में भारतीय बार संघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में चटर्जी ने सार्वजनिक रूप से कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायिक हस्तक्षेप की तारीफ की थी।
उन्होंने कहा कि आप अदालतों के आदेशों की आलोचना करने के लिए संभवत: दोहरे मानदंड नहीं अपना सकते। चटर्जी की कानूनी समझ के प्रति मेरे परम सम्मान के मद्देनजर 2जी मामले में उनके आलोचना को लेकर गढ़े गये तर्क से मैं थोड़ा निराश हूं।
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