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भूकम्प के खतरे पर खड़ा टिहरी बांध
हैदराबाद, एजेंसी First Published:09-12-2012 08:51:20 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) के वैज्ञानिकों ने यहां एक रपट में कहा है कि टिहरी बांध के नीचे एक सक्रिय गड़बड़ी मौजूद है, जो भूकम्प के खतरे को बढ़ावा देता है। टिहरी बांध हिमालय के कुमाऊं-गढ़वाल क्षेत्र में उत्तराखण्ड के टिहरी शहर के नजदीक स्थित है।

एनजीआरआई के संदीप गुप्ता और उनके सहकर्मियों ने इंडियन एकेडेमी ऑफ साइंसेस द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘करेंट साइंस’ के ताजा अंक में अपनी रपट में दावा किया है, ‘स्थानीय भूकम्पीयता के कारण इस सक्रिय गड़बड़ी पर मौजूद ढांचागत भार जलाशय के भार के साथ मिलकर भूकम्प पैदा कर सकता है और इस क्षेत्र में अतिरिक्त भूकम्पीय खतरा बन सकता है।’

वैज्ञानिकों ने कहा कि उनके निष्कर्ष हिमालय के कुमाऊं-गढ़वाल क्षेत्र में आमतौर पर और खासतौर पर टिहरी बांध के चारों ओर मौजूद भूकम्पीय स्वरूप को मापने से प्राप्त हुए सबूत पर आधारित हैं। इसमें वैज्ञानिकों ने एक अस्थायी भूकम्प विज्ञान नेटवर्क की टिप्पणियों का उपयोग किया। इस नेटवर्क का संचालन वैज्ञानिकों ने 2004-2008 के दौरान 39 महीने से अधिक समय तक किया था। इस अवधि के दौरान बांध स्थल के चारों ओर 20 किलोमीटर के दायरे में 1.6 से 2.8 तीव्रता वाले 20 से अधिक भूकम्प दर्ज किए गए थे।

वैज्ञानिकों के अनुसार, बांध स्थल का चयन 1961 में उस समय किया गया था, जब प्लेट टेक्टॉनिक्स थिअरी जन्म ले रही थी और अनुसंधानकर्ता हिमालय में भूकम्प के लिए जिम्मेदार मूल प्रक्रियाओं के बारे में बहुत जानकारी नहीं रखते थे। उसके बाद से हिमालय के विकास और उससे जुड़े भूकम्पीय खतरों से सम्बंधित हमारी सैंद्धांतिक समझ और विचारों में काफी बदलाव आ चुका है।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि टिहरी बांध भविष्य में सम्भावित बड़े भूकम्पों के क्षेत्र में स्थित है। इसके पहले 7.7 तीव्रता वाला पिछला बड़ा भूकम्प 209 वर्ष पहले 1803 में श्रीनगर-गढ़वाल के करीब आया था। इसके बाद कई भूकम्प आए। इसमें 1991 में उत्तरकाशी में आया 6.8 तीव्रता का भूकम्प भी शामिल है, जिसने इस क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था और भारतीय पट्टी में हुई हलचल के कारण जमा ऊर्जा का कुछ हिस्सा बाहर निकल गया था।

एनजीआरआई के वैज्ञानिकों का दावा है, ‘अभी भी सम्भवत: कम से कम आठ तीव्रता वाले किसी भूकम्प से बड़ी मात्र में बचा हुआ तनाव बाहर निकल सकता है।’

 
 
 
 
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