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संतों की शिक्षा स्कूल पाठ्यक्रम में हो शामिल: आडवाणी
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:04-01-13 02:52 PM
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आज सुझाव दिया कि स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में केवल राजाओं की कहानियों की बजाय साधुओं और संतों के बारे भी बताया जाना आवश्यक है।
अपने नए ब्लॉग में उन्होंने लिखा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे साधुओं-संतों के असाधारण योगदान को बच्चों से आमतौर पर दूर रखा गया है, और अक्सर यह दुहाई दी जाती है कि एक धर्मनिर्पेक्ष देश में धर्म से जुड़ा कोई भी पहलू वर्जित है। यह एक बेतुका दृष्टिकोण है।
उन्होंने कहा कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे संतों की शिक्षाओं और आदर्शों को सामान्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाता है तो इससे हमारे स्कूली अध्ययन का स्तर बढ़ेगा।
इस बात को आडवाणी ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि अभी हमारे स्कूलों की इतिहास की पढ़ाई पूरी तरह राजाओं, राजवंशों और उनके बीच युद्धों से उनके लाभ-हानि पर केन्द्रित हैं और पाठ्यक्रमों में उस समय के साधु संतों का कोई उल्लेख नहीं है, जिन्होंने समाज को किसी ना किसी रूप में अत्यधिक प्रभावित किया है।
उन्होंने सुझाव दिया कि जिस तरह आई क्यू (बौद्धिक पुट) के बाद अब एम क्यू (भावानात्मक पुट) पर जोर दिया जाने लगा है, उसी तरह हमें एस क्यू यानी आध्यात्मिक पुट पर भी ध्यान देना चाहिए।
भाजपा नेता ने कहा कि एस क्यू की बात करते हुए उनके मन में कोई भी धर्म या पंथ नहीं है, बल्कि उनके मन में केवल यह है कि एक छात्र अपने शिक्षण संस्थान से क्या नैतिक मूल्य ग्राहय करता है।
अपने नए ब्लॉग में उन्होंने लिखा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे साधुओं-संतों के असाधारण योगदान को बच्चों से आमतौर पर दूर रखा गया है, और अक्सर यह दुहाई दी जाती है कि एक धर्मनिर्पेक्ष देश में धर्म से जुड़ा कोई भी पहलू वर्जित है। यह एक बेतुका दृष्टिकोण है।
उन्होंने कहा कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे संतों की शिक्षाओं और आदर्शों को सामान्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाता है तो इससे हमारे स्कूली अध्ययन का स्तर बढ़ेगा।
इस बात को आडवाणी ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि अभी हमारे स्कूलों की इतिहास की पढ़ाई पूरी तरह राजाओं, राजवंशों और उनके बीच युद्धों से उनके लाभ-हानि पर केन्द्रित हैं और पाठ्यक्रमों में उस समय के साधु संतों का कोई उल्लेख नहीं है, जिन्होंने समाज को किसी ना किसी रूप में अत्यधिक प्रभावित किया है।
उन्होंने सुझाव दिया कि जिस तरह आई क्यू (बौद्धिक पुट) के बाद अब एम क्यू (भावानात्मक पुट) पर जोर दिया जाने लगा है, उसी तरह हमें एस क्यू यानी आध्यात्मिक पुट पर भी ध्यान देना चाहिए।
भाजपा नेता ने कहा कि एस क्यू की बात करते हुए उनके मन में कोई भी धर्म या पंथ नहीं है, बल्कि उनके मन में केवल यह है कि एक छात्र अपने शिक्षण संस्थान से क्या नैतिक मूल्य ग्राहय करता है।
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भाजपा| वरिष्ठ नेता| लालकृष्ण आडवाणी| स्कूल| इतिहास| संत
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