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मायावती को बड़ी राहत, नहीं होगी सीबीआई जांच
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:06-07-12 12:32 PM
Last Updated:06-07-12 06:30 PM
बसपा सुप्रीमो मायावती को बड़ी राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उनके खिलाफ नौ साल पुराने आय से अधिक संपत्ति मामले को खारिज कर दिया। न्यायालय ने साथ ही अदालत से स्पष्ट निर्देशों के बिना मायावती के खिलाफ जांच शुरू करने पर सीबीआई की खिंचाई की।
शीर्ष अदालत ने कहा कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा अपनाया गया तरीका गैर जरूरी था और एजेंसी ने ताज कॉरिडोर घोटाले में अदालत के आदेशों को सही ढंग से समझे बिना ही उनके खिलाफ कार्यवाही की।
न्यायमूर्ति पी सतशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ ने घोटाले में राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने से जुड़े उच्चतम न्यायालय के आदेश को स्पष्ट किया और कहा कि आय के ज्ञात स्रोतों से कथित रूप से अधिक संपत्ति के मामले में मायावती के खिलाफ अलग से प्राथमिकी दर्ज करने का कोई आदेश नहीं दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि सीबीआई की सितंबर 2008 की स्थिति रिपोर्ट में इस तरह का कोई निष्कर्ष नहीं है कि मायावती ने 1995 से 2003 के दौरान आय से कथित रूप से अधिक संपत्ति अर्जित की।
पीठ ने सीबीआई की स्थिति रिपोर्ट के संदर्भ में कहा कि ताज कॉरिडोर घोटाले में याचिकाकर्ता (मायावती) के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में कोई ठोस रिपोर्ट नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसका 2002 का आदेश विशेष तौर पर ताज कॉरिडोर घोटाले से संबंधित था और मायावती के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने को लेकर कोई निर्देश नहीं दिये गये थे, जैसा कि सीबीआई ने किया।
पीठ ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत मायावती के खिलाफ अलग से प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कोई निर्देश नहीं दिये गये। पीठ ने कहा कि सीबीआई ने हमारे आदेशों को सही ढंग से समझे बिना कार्यवाही की।
उन्होंने कहा कि सीबीआई द्वारा अपनाया गया तरीका गैरजरूरी था। शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी ने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामला दर्ज करके अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाया जबकि न्यायालय की ओर से इस तरह का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।
पीठ ने कहा कि सीबीआई को केवल एक प्राथमिकी (ताज कॉरिडोर मामले में) दर्ज करनी चाहिए थी। उच्चतम न्यायालय ने (मायावती के खिलाफ) दूसरी प्राथमिकी दर्ज करने का कोई निर्देश नहीं दिया था।
शीर्ष अदालत ने मायावती की उस याचिका पर फैसला सुनाया है जिसमें सीबीआई द्वारा दर्ज आय से अधिक संपत्ति मामले में उनके खिलाफ कार्यवाही खारिज करने की मांग की गई थी।
मायावती ने आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ मामला चलाकर एजेंसी का राजनीतिक औजार के तौर पर उपयोग किया जा रहा है।
मायावती ने मई 2008 में शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था और सीबीआई द्वारा नौ साल पहले दर्ज आय से अधिक संपत्ति मामले में उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खारिज करने की मांग की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह उनके खिलाफ राजनीतिक दुश्मनी के तहत उठाया गया कदम है।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद इस साल एक मई को अपना आदेश सुरक्षित रखा था। मायावती ने कहा था कि पीठ को आयकर न्यायाधिरण द्वारा पारित उस आदेश को ध्यान में रखकर सीबीआई को निर्देश देना चाहिए जिसमें न्यायाधिकरण ने कहा था कि उनकी आय वास्तविक है।
उन्होंने कहा था कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इसी आदेश को बरकरार रखा। सीबीआई ने आरोप लगाया था कि यह साबित करने के पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होंने अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी।
मायावती ने दावा किया था कि उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं से दान के रूप में यह धन मिला था। मायावती की संपत्ति पर सवाल खड़े करते हुए सीबीआई ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2003 में उनकी घोषित संपत्ति एक करोड़ रुपये की थी जो वर्ष 2007 में बढ़कर 50 करोड़ की हो गई।
सीबीआई ने 13 सितंबर 2011 को दायर अपने अंतिम हलफनामे में आरोप लगाया था कि मायावती और उनके रिश्तेदारों के बीच आपराधिक गठजोड़ है और उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामला आयकर विभाग के निष्कर्षों के आधार पर बंद नहीं किया जा सकता।
एजेंसी ने मायावती की इस दलील को भी खारिज किया था कि आयकर अधिकारियों द्वारा उनके आयकर मूल्यांकन स्वीकार किये जाने के बाद आय से अधिक संपत्ति मामला बंद होना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा अपनाया गया तरीका गैर जरूरी था और एजेंसी ने ताज कॉरिडोर घोटाले में अदालत के आदेशों को सही ढंग से समझे बिना ही उनके खिलाफ कार्यवाही की।
न्यायमूर्ति पी सतशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ ने घोटाले में राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने से जुड़े उच्चतम न्यायालय के आदेश को स्पष्ट किया और कहा कि आय के ज्ञात स्रोतों से कथित रूप से अधिक संपत्ति के मामले में मायावती के खिलाफ अलग से प्राथमिकी दर्ज करने का कोई आदेश नहीं दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि सीबीआई की सितंबर 2008 की स्थिति रिपोर्ट में इस तरह का कोई निष्कर्ष नहीं है कि मायावती ने 1995 से 2003 के दौरान आय से कथित रूप से अधिक संपत्ति अर्जित की।
पीठ ने सीबीआई की स्थिति रिपोर्ट के संदर्भ में कहा कि ताज कॉरिडोर घोटाले में याचिकाकर्ता (मायावती) के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में कोई ठोस रिपोर्ट नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसका 2002 का आदेश विशेष तौर पर ताज कॉरिडोर घोटाले से संबंधित था और मायावती के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने को लेकर कोई निर्देश नहीं दिये गये थे, जैसा कि सीबीआई ने किया।
पीठ ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत मायावती के खिलाफ अलग से प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कोई निर्देश नहीं दिये गये। पीठ ने कहा कि सीबीआई ने हमारे आदेशों को सही ढंग से समझे बिना कार्यवाही की।
उन्होंने कहा कि सीबीआई द्वारा अपनाया गया तरीका गैरजरूरी था। शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी ने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामला दर्ज करके अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाया जबकि न्यायालय की ओर से इस तरह का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।
पीठ ने कहा कि सीबीआई को केवल एक प्राथमिकी (ताज कॉरिडोर मामले में) दर्ज करनी चाहिए थी। उच्चतम न्यायालय ने (मायावती के खिलाफ) दूसरी प्राथमिकी दर्ज करने का कोई निर्देश नहीं दिया था।
शीर्ष अदालत ने मायावती की उस याचिका पर फैसला सुनाया है जिसमें सीबीआई द्वारा दर्ज आय से अधिक संपत्ति मामले में उनके खिलाफ कार्यवाही खारिज करने की मांग की गई थी।
मायावती ने आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ मामला चलाकर एजेंसी का राजनीतिक औजार के तौर पर उपयोग किया जा रहा है।
मायावती ने मई 2008 में शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था और सीबीआई द्वारा नौ साल पहले दर्ज आय से अधिक संपत्ति मामले में उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खारिज करने की मांग की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह उनके खिलाफ राजनीतिक दुश्मनी के तहत उठाया गया कदम है।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद इस साल एक मई को अपना आदेश सुरक्षित रखा था। मायावती ने कहा था कि पीठ को आयकर न्यायाधिरण द्वारा पारित उस आदेश को ध्यान में रखकर सीबीआई को निर्देश देना चाहिए जिसमें न्यायाधिकरण ने कहा था कि उनकी आय वास्तविक है।
उन्होंने कहा था कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इसी आदेश को बरकरार रखा। सीबीआई ने आरोप लगाया था कि यह साबित करने के पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होंने अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी।
मायावती ने दावा किया था कि उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं से दान के रूप में यह धन मिला था। मायावती की संपत्ति पर सवाल खड़े करते हुए सीबीआई ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2003 में उनकी घोषित संपत्ति एक करोड़ रुपये की थी जो वर्ष 2007 में बढ़कर 50 करोड़ की हो गई।
सीबीआई ने 13 सितंबर 2011 को दायर अपने अंतिम हलफनामे में आरोप लगाया था कि मायावती और उनके रिश्तेदारों के बीच आपराधिक गठजोड़ है और उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामला आयकर विभाग के निष्कर्षों के आधार पर बंद नहीं किया जा सकता।
एजेंसी ने मायावती की इस दलील को भी खारिज किया था कि आयकर अधिकारियों द्वारा उनके आयकर मूल्यांकन स्वीकार किये जाने के बाद आय से अधिक संपत्ति मामला बंद होना चाहिए।
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