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व्यक्तिगत स्वतंत्रता अनमोल अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:20-05-12 03:37 PM
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त 'सबसे अनमोल और महत्वपूर्ण' अधिकार है। इसे कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बगैर वापस नहीं लिया जा सकता।

न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पहले से हिरासत में है तो उसकी (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत) हिरासत बरकरार रखने का आदेश तभी दिया जा सकता है जब इस बात की वास्तव में आशंका हो कि उसके जमानत पर रिहा होने से कानून-व्यवस्था को नुकसान हो सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने कहा कि आपराधिक मामले के संदर्भ में किसी ऐसे व्यक्ति की हिरासत का आदेश पारित करने पर कोई रोक नहीं है, जो पहले से ही कैद में हैं।

पीठ ने कहा, ''नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता अटल है और राज्य बिना कानूनी प्रक्रिया के इसे वापस नहीं ले सकते।'' न्यायमूर्ति चौहान ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के बगैर यदि राज्य किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण करता है तो यह संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य न्यायालयों को इसकी अनुमति दी कि वे पहले से ही जेल में बंद लोगों को हिरासत में लेने का आदेश दे सकते हैं, यदि इस बात की वास्तविक आशंका हो कि उसके जमानत पर रिहा होने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश पिछले साल 30 जून को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत पश्चिमी इम्फाल जिला न्यायालय द्वारा पारित हिरासत में लिए जाने के आदेश को निरस्त करते हुए दिया।  हिरासत में लेने के इस आदेश को गुवाहाटी उच्च न्यायालय की इम्फाल पीठ ने 13 जून 2०12 को सही ठहराया था।

सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश हुईडरोम शांतिकुमार सिंह की याचिका पर आया, जिनके बेटे को हिरासत में लिया जाना था। उनके बेटे को 19 जून, 2०11 को गिरफ्तार किया गया था।

उसके हिरासत में लेने का आदेश जारी करते हुए जिला मजिस्ट्रेट ने आशंका जताई थी कि वह राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो सकता है। उस पर जबरन वसूली और प्रतिबंधित कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी को आश्रय देने का आरोप लगाया गया।

न्यायालय ने कहा, ''महज इसलिए कि इसी से मिलते-जुलते एक मामले में किसी को जमानत दी जा चुकी है, ऐसी कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए कि इस मामले में भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को जमानत मिल ही जाएगी।''

न्यायालय ने कहा कि क्योंकि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने जमानत याचिका नहीं दाखिल की है और न ही कोई अन्य सहआरोपी फरार है और न ही जमानत पर है। ऐसे में उस पर रासुका नहीं लगाया जा सकता। इसलिए हिरासत में रखने का आदेश निराधार अनुमानों पर आधारित है और उसे कानूनन बरकरार नहीं रखा जा सकता।

 
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