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अलविदा कह गया एक और सितारा
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:12-12-12 03:12 PM
Last Updated:12-12-12 05:51 PM
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संगीत की दुनिया के फलक पर सितार वादन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पंडित रविशंकर एक बेहतरीन सितार वादक होने के अलावा एक बेहतरीन संगीत निर्देशक भी थे।

पंडित रविशंकर का जन्म 7 अप्रैल 1920 को वाराणसी में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम रविंद्र शंकर चौधरी था। उनके पिता श्याम शंकर झालवाड़ राज्य के दीवान थे और मां हेमांगिनी देवी गृहिणी। कुछ समय बाद दीवान श्याम शंकर लंदन जाकर वकालत करने लगे और वहीं दूसरी शादी भी कर ली। श्याम शंकर ने अपने पुत्र रविशंकर को आठ वर्ष बाद ही देखा था।

पंडित रविशंकर 10 साल की उम्र में अपने बडे़ भाई और मशहूर डांसर उदय शंकर के डांस ग्रुप के साथ पहली बार पेरिस गए थे। वह 13 साल की उम्र में इसी ग्रुप में शामिल हो गए और देश-विदेश जाकर परफॉर्मेंस करने लगे। इसी डांस ग्रुप के साथ भ्रमण करते हुए उन्होंने फ्रेंच भाषा सीखी। इसी दौरान वह पाश्चात्य नृत्य, संगीत और संस्कृति के संपर्क में आए।

इसी दौरान एक घटना ने उनके जीवन को अप्रत्याशित मोड़ दे दिया। संभवतः अगर उनके जीवन में मशहूर सरोद और शहनाई वादक उस्ताद अलाउद्दीन खान नहीं आते, तो पंडित रविशंकर अपने भाई उदय शंकर के ही पदचिह्नों पर चलते और सितार वादन को आज जैसी प्रसिद्धी नहीं मिल पाती।

दरअसल उदय शंकर ने दिसंबर 1934 में उस्ताद अलाउद्दीन खान को कलकत्ता (अब कोलकाता) में आयोजित एक संगीत कार्यक्रम के दौरान सुना था। उन्होंने 1935 में किसी तरह मैहर के महाराजा को मनाया कि उस्ताद को कुछ दिनों के लिए उनके डांस ग्रुप का संगीतकार बना दिया जाए। उदय शंकर का डांस ग्रुप पेरिस जा रहा था और इसी दौरान रविशंकर उस्ताद के संपर्क में आए।

पंडित रविशंकर पहले नर्तक के रूप में ही प्रशिक्षण ले रहे थे, लेकिन उस्ताद की कला ने उनका मन मोह लिया। पेरिस के दौरे में उस्ताद ने पंडित रविशंकर को वाद्ययंत्रों से परिचित कराया। पंडित रविशंकर ने जब उस्ताद से कहा कि वह उन्हें अपना शिष्य बना लें, तो उस्ताद ने यह शर्त रखी कि अगर वह दौरे पर जाना बंद करके मैहर आकर रहेंगे, तब ही वह उनके शिष्य बन सकते हैं।

उन्होंने 1938 में नृत्य को अलविदा कह दिया। उस्ताद ने पंडित रविशंकर को सितार रुद्रवीणा, वीणा, रुबाब, सुरसिंगार और सुरबहार का प्रशिक्षण दिया। इसके अलावा उन्हें ध्रुपद, ख्याल और धमार रागों का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। संगीत का प्रशिक्षण लेने के अलावा वह उस्ताद के पुत्र अली अकबर खान और पुत्री रोशनआरा खान के साथ पढा़ई भी करते थे। रोशनआरा खान ही बाद के वर्षों में अन्नपूर्णा देवी के नाम से जानी गईं। वर्ष 1939 में पंडित रविशंकर ने अली अकबर खान के साथ पहली बार परफॉर्मेंस किया।

अली अकबर खान सरोद बजाते थे। पंडित रविशंकर का प्रशिक्षण 1944 में खत्म हो गया और इसके साथ ही उन्होंने पढा़ई भी छोड़ दी। प्रशिक्षण के बाद पंडित रविशंकर मैहर छोडकर मुंबई चले गए और वहां इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के लिए 1945 और 1946 में बैले डांस के लिए संगीत निर्देशन किया। वह फरवरी 1949 से ऑल इंडिया रेडियो में बतौर संगीत निर्देशक काम करने लगे।

उन्होंने जनवरी 1956 में ऑल इंडिया रेडियो छोड़ दिया। उन्होंने 1950 में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे की फिल्म 'अप्पू' का भी संगीत निर्देशित किया था। वर्ष 1952 में ऑल इंडिया रेडियो के निदेशक वीके नारायणन मेनन ने उनका परिचय विश्वप्रसिद्ध वायलिन वादक यहूदी मेनूहिन से कराया। रविशंकर ने 1953 में तत्कालीन सोवियत संघ में परफॉर्म किया।

यहूदी मेनूहिन ने पंडित रविशंकर को 1955 में न्यूयॉर्क में परफॉर्म करने के लिए आमंत्रित किया, हालांकि वह उस समय पारिवारिक परेशानी की वजह से इस कार्यक्रम में शरीक नहीं हो सके। इसके बाद पंडित रविशंकर ने यहूदी मेनूहिन और बिटल्स के रॉक स्टार जार्ज हैरिसन के साथ विदेशी दौरों में धूम मचा दी।

पंडित रविशंकर 1986 से 1992 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति भवन और लंदन में भी कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम पेश किए।

 

 
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