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'एफडीआई पर तटस्थ रहने वालों को इतिहास माफ नहीं करेगा'
नई दिल्ली, एजेंसी First Published:05-12-12 02:16 PMLast Updated:06-12-12 09:34 AM

लोकसभा में मत विभाजन के तहत मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर शुरू हुई चर्चा को आगे बढ़ाते हुए विपक्ष ने सरकार से अपने इस फैसले को वापस लेने का आग्रह किया और इस मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाने वाले राजनीतिक दलों को आगाह किया कि इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा।
  
माकपा ने बासुदेव आचार्य ने सरकार के इस दावे को गलत बताया कि खुदरा क्षेत्र में एफडीआई लाने से किसानों और खुदरा क्षेत्र के लोगों को लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत एफडीआई से किसानों और छोटे दुकानदारों का ही सबसे अधिक अहित होगा।
   
उन्होंने कहा कि खुदरा क्षेत्र में एफडीआई लाने से अगर रोजगार के अवसर बढ़ें, उत्पादन बढ़े या देश में नयी तकनीक आए तो वाम दल भी इसका समर्थन करने को तैयार हैं, लेकिन चूंकि इसका उल्टा होने जा रहा है, इसीलिए वे इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।
   
माकपा नेता ने सरकार के इस आरोप को गलत बताया एफडीआई मुद्दे पर वामपंथी दलों में असंगति है। उन्होंने कहा कि इस मामले में असंगति सरकार में है।

उन्होंने याद दिलाया कि राजग के शासन के समय जब एफडीआई लाने का प्रयास किया गया था, तब राज्यसभा में विपक्ष के नेता की हैसियत से वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उसकी मुखालफत करते हुए पत्र तक लिखा था। यही नहीं उस समय लोकसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक प्रियरंजन दासमुंशी ने एफडीआई लाने के राजग के प्रयास को राष्ट्र-विरोधी तक करार दिया था।
   
जद-यू के शरद यादव ने एफडीआई के विरोध में हुए बंद में शामिल होने वाले कुछ दलों की ओर से अब सदन में इस मुद्दे पर सरकार का साथ दिए जाने की स्थिति में उन्हें आगाह किया कि इतिहास इसके लिए उन दलों को माफ नहीं करेगा।
   
उन्होंने सपा नेता मुलायम सिंह यादव से मुखातिब होते हुए कहा कि वह उस बंद में शामिल सपा और द्रमुक सहित उन सब दलों को कहना चाहेंगे :
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र
जो तटस्थ हैं समर लिखेगा उनका भी इतिहास।
   
सरकार को उन्होंने आगाह किया कि वह जोड़ तोड़ से एफडीआई लाने का प्रयास न करे। इससे न सिर्फ देश को नुकसान होगा बल्कि आगामी चुनाव में कांग्रेस को भी ऐसा धक्का लगेगा, जैसा उसे कभी नहीं लगा होगा।
   
जदयू नेता ने कहा कि जो लोग एफडीआई लाने पर अड़े हैं, वे देश को तबाही की ओर ले जा रहे हैं। ऐसे लोग केवल अमीरों की खुशियों को ध्यान में रख रहे हैं और गरीब भारत के हितों की अनदेखी कर रहे हैं।
   
एफडीआई के समर्थकों को उन्होंने आगाह किया कि विदेशी कंपनियां देश के गरीबों और किसानों का हित करने की नीयत से नहीं, बल्कि केवल ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की नीयत से भारत में निवेश करेंगी।
   
अमेरिका के साथ परमाणु संधि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि परमाणु संयत्रों में दुर्घटना होने की स्थिति में संसद द्वारा कड़े कानून बनाए जाने के बाद अब अमेरिका उससे भाग रहा है, क्योंकि उसे केवल मुनाफा चाहिए। दुर्घटना होने की स्थिति में वह मुआवजा देने को तैयार नहीं है।

शिवसेना के अनंत गीते ने बहु ब्रांड खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की इजाजत दिये जाने के सरकार के फैसले का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि ऐसा करके सरकार एक नई ईस्ट इंडिया कंपनी को न्यौता देने जा रही है।
    
उन्होंने कहा कि देश में करीब पांच करोड़ खुदरा व्यापारी हैं और कुल मिलाकर 25 करोड़ लोग खुदरा कारोबार से जुड़े हुए हैं, जिनके जीवन पर खुदरा व्यापार में एफडीआई से बुरा प्रभाव पड़ेगा।
    
गीते ने कहा कि सरकार के इस फैसले का बुरा असर सिर्फ खुदरा व्यापार पर ही नहीं, बल्कि कृषि और बागवानी क्षेत्र में लगे 50 करोड़ लोगों पर भी पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इन छोटे छोटे व्यापारियों का निवाला छीन कर वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को देने जा रही है।
    
बीजू जनता दल के भतुहरि महताब ने भी एफडीआई के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने शुरू से ही इसका विरोध किया है। उन्होंने इस बात से भी असहमति जताई कि इस फैसले से खाद्यान्न का उत्पादन बढेगा और खाद्य वस्तुओं की बर्बादी को रोका जा सकेगा।
   
उन्होंने कहा कि ऐसा कहा जा रहा है कि वालमार्ट जैसी कंपनियां 30 फीसदी सामान भारत से खरीदेंगी लेकिन इसकी निगरानी कौन करेगा, आखिर कौन देखेगा कि कंपनियां ऐसा कर रही हैं या नहीं 
    
केन्द्र और महाराष्ट्र में सरकार की सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि जहां तक महाराष्ट्र में इसे लागू करने की बात है राज्य में समन्वय समिति है वह खुदरा व्यापार में एफडीआई के मुद्दे पर चर्चा करेगी और गुणदोष के आधार पर निर्णय करेंगी।
    
उन्होंने विपक्ष की इस राय को गलत बताया कि एफडीआई देश के लिए बुरा है। उन्होंने कहा कि 90 के दशक में अपनायी गई उदारीकरण की नीति के परिणाम आज देखने को मिल रहे हैं। 2011-12 में भारत ने करीब एक लाख 87 हजार करोड़ रुपये की कृषि उपज का निर्यात किया जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा हम भी चाहेंगे कि चीजों का जायजा लिया जाये। हम भी नहीं चाहते कि छोटे व्यापारी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
   
एफडीआई नीति को जनविरोधी, किसान विरोधी करार देते हुए अन्नाद्रमुक के एम थम्बीदुरई ने कहा कि कांग्रेस नीत केंद्र सरकार अल्पमत सरकार है और ऐसी अल्पमत सरकार इस तरह का नीतिगत निर्णय कैसे कर सकती है
   
उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल ने भाजपा के 2004 के घोषणा पत्र में खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का उल्लेख किये जाने का जिक्र किया है उन्हें यह समझना चाहिए कि जनता ने उस चुनाव में भाजपा को स्वीकार नहीं किया। देश की जनता इस जनविरोधी नीति के खिलाफ है।
   
द्रमुक पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अगर आप (द्रमुक) केंद्र में एफडीआई का समर्थन करते हैं तब तमिलनाडु में कैसे विरोध कर पायेंगे। क्या तमिलनाडु श्रीलंका में है।

 
 
 
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