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सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी प्रक्रिया को बताया दोषपूर्ण
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:03-02-12 11:32 AM
Last Updated:04-02-12 12:07 AM
ऐसा लगता है कि सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने आयु गतिरोध पर पहले दौर की कानूनी लड़ाई जीत ली है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि जिस तरीके से उनकी वैधानिक शिकायत को खारिज किया गया है, वह दुर्भावना से ग्रस्त लगता है।
न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवायी 10 फरवरी को तय करते हुए यह जानना चाहा कि क्या सरकार 30 दिसम्बर 2011 के अपने आदेश का वापस लेना चाहेगी।
रक्षा मंत्री एके एंटनी ने 30 दिसम्बर को एक आदेश जारी किया था जिसमें जनरल सिंह की उस वैधानिक शिकायत को खारिज कर दिया गया था जिसमें कहा गया था कि सेना के रिकार्ड में उनकी जन्मतिथि को 10 मई 1950 नहीं बल्कि 10 मई 1951 माना जाए।
न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा और न्यायमूर्ति एचएल गोखले की पीठ ने सरकार पर प्रश्न उठाये। पीठ का मानना था कि रक्षा मंत्रालय का 21 जुलाई 2011 का वह आदेश अटॉर्नी जनरल की राय पर आधारित था, जिसमें जन्मतिथि को 10 मई 1950 माना गया था। इसके साथ ही वह मामला भी उनके (अटार्नी जनरल की) राय पर आधारित था जब 30 दिसम्बर को वैधानिक शिकायत पर आदेश पारित किया गया था।
जब न्यायालय ने पूछा कि क्या सरकार 30 दिसम्बर का अपना आदेश वापस लेना चाहेगी अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने कहा कि वह इस मुद्दे पर सरकार के निर्देश प्राप्त करेंगे।
न्यायालय ने कहा कि यदि सरकार 30 दिसम्बर के अपने आदेश को वापस ले लेती है तो जनरल सिंह के समक्ष अन्य उपाय उपलब्ध हैं। न्यायालय ने कहा कि उस स्थिति में 21 जुलाई के आदेश के खिलाफ जनरल सिंह की वैधानिक शिकायत पर प्राधिकारियों द्वारा पुन:विचार किया जा सकता है तथा इसके अलावा उनके पास सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में जाने का विकल्प भी है।
सुनवायी के दौरान पीठ ने कहा कि जब यह कहा गया कि जनरल सिंह की शिकायत विचार योग्य नहीं है तब उनके पास सुप्रीम कोर्ट में आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। पीठ ने शुरू से ही सरकार की निर्णय लेने की प्रक्रिया पर प्रश्न खड़ा किया।
पीठ ने कहा कि हमें जितनी चिंता निर्णय को लेकर नहीं है उतनी निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर है जो कि दुर्भावना से ग्रस्त है क्योंकि 21 जुलाई का आदेश अटॉर्नी जनरल की ओर से दी गई राय पर विचार करके दिया गया। जब 30 दिसम्बर को सेनाध्यक्ष की ओर से दी गई वैधानिक शिकायत पर निर्णय किया गया तब अटॉर्नी जनरल की राय पर भी विचार विमर्श किया गया।
पीठ ने आगे कहा, रिकॉर्ड की सामग्री नैसर्गिक न्याय और कानून के सिद्धांत पर खरी नहीं उतरती। अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल रोहिनटन नरीमन ने सरकार के कदम का बचाव किया और कहा कि तथ्यों पर जनरल सिंह के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं बरता गया है।
न्यायालय के आदेश पर जनरल सिंह के एक वकील पुनीत बाली ने कहा कि वे इस आदेश से निश्चित रूप से प्रसन्न हैं लेकिन वे मामले के गुणदोष में नहीं जाएंगे क्योंकि मामला अभी विचाराधीन है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय की ओर से मुख्य प्रश्न यह उठाया गया कि जिस प्राधिकारी ने जनरल सिंह की वैधानिक शिकायत को खारिज किया उसने अपना निर्णय अटॉर्नी जनरल की सलाह पर आधारित किया, जिन्होंने पूर्व में सरकार को सलाह दी थी कि वह 21 जुलाई के अपने आदेश में अंतिम निर्णय करे।
बाली ने मीडिया से इसके बहुत अधिक अर्थ नहीं निकालने के लिए कहते हुए कहा कि अदालत के लिए प्रश्न खड़ा करना सामान्य प्रक्रिया है। जब अटॉर्नी जनरल राय देने में अपने कार्यकलाप का बचाव कर रहे थे, पीठ ने कहा कि हम संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर अधिक चिंतित हैं, क्या 30 दिसम्बर का यह आदेश नैसर्गिक न्याय और कानून के सिद्धांतों पर खरा उतरता है।
पीठ ने साथ ही अटार्नी जनरल से यह भी पूछा कि क्या सरकार 30 दिसम्बर के अपने आदेश को वापस लेना चाहती है। उसने कहा, स्पष्ट कीजिये कि क्या आप 30 दिसम्बर के आदेश को वापस लेना चाहते हैं। इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा, मैं निर्देश प्राप्त करूंगा।
न्यायालय ने उनसे कहा, आप इस आदेश पर अपना रुख तय करिये। पीठ ने इसके साथ ही सरकार से पूछा कि क्यों नहीं इस मामले को समाप्त कर दिया जाए। इस बीच यह सुझाव दिये गए कि जनरल सिंह सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के पास जा सकते हैं। पीठ ने कहा कि उन्हें अवकाश ग्रहण करने में केवल चार महीने ही शेष रह गए हैं इसलिए यह संभवत: सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं होगा।
पीठ ने साथ ही यह भी कहा कि हालांकि न्यायाधिकरण का नेतृत्व उसके अवकाशप्राप्त न्यायाधीश करते हैं लेकिन उसमें ऐसे सदस्य भी होते हैं जो सेना से आते हैं और ऐसी संभावना है कि वे किसी समय जनरल सिंह के कनिष्ठ या वरिष्ठ रहे हों।
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