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कथा बीटी बैंगन की: जब भावनाएं रहीं उफान पर
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:09-02-10 07:32 PM
Last Updated:09-02-10 08:47 PM
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सरकार ने बीटी बैंगन की व्यावसायिक खेती पर फैसला फिलहाल टाल दिया है, लेकिन देश के कृषि जगत के समक्ष यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा और इसे लेकर भावनाएं भी उफान पर रहीं।

सत्तर के दशक में हरित क्रांति के बाद से देश के कृषि जगत में किसी और फसल को लेकर इतनी उत्सुकता पैदा नहीं हुई, जितनी आनुवांशिक तौर पर संवर्धित इस पहली सब्जी बीटी बैंगन को लेकर जागी है।

इस पूरे मामले में हॉट सीट पर रहे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, जिन पर यह फैसला करने की जिम्मेदारी है कि देश आनुवांशिक तौर पर संवर्धित इस फसल को अपनाने के लिये तैयार है या नहीं। इस मुद्दे पर फैसले से पहले वह पिछले वर्ष दिसंबर में ही कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में गहन माथापच्ची कर लौटे थे।

बीटी बैंगन के समर्थक और विरोधी समूहों के बीच फंसे इस मंत्री पर जनसुनवाई के दौरान एक बार हिटलर जैसा होने का भी आरोप लगा, जब बेंगलूर जैसे कुछ शहरों में आम लोगों से सलाह़ मशविरा करने के दौरान उन पर तीखे आक्षेप लगाये गये।

जैव प्रौद्योगिकी उद्योग जगत की हस्ती और बायोकॉन प्रमुख किरण मजूमदार शॉ चाहती थीं कि बीटी बैंगन पर आकलन राजनीति और भावनाओं से प्रभावित न हो।

सात शहरों कोलकाता, भुवनेश्वर, अहमदाबाद, नागपुर, चंडीगढ़, हैदराबाद और बेंगलूर में हुई जनसुनवाई के दौरान रोष, तीखी बयानबाजी और वैज्ञानिक दलीलें देखी गयीं। इस बीटी फसल के समर्थक और विरोधी समूहों से हमलों का सामना करने के चलते रमेश ने कई बार सार्वजनिक तौर पर नाराजगी भी जाहिर की।

गैऱ सरकारी संगठनों, किसानों, चिकित्सकों और वैज्ञानिकों की तीखी प्रतिक्रिया का सामना कर रहे रमेश ने बेंगलूर में हुई सातवीं और आखिरी जनसुनवाई के दौरान अपने विरोधियों को आड़े हाथों लेते हुए कहा, मैं आपकी बात नहीं सुनूंगा।

कोलकाता में हुई पहली जनसुनवाई में भी काफी तीखी बहस हुई। जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनी मोनसांटो का एजेंट होने का आरोप लगने के बाद मंत्री का धैर्य जवाब दे गया। बेंगलूर में यह आरोप लगने के बाद रमेश ने कहा, मैं मोनसांटो का एजेंट नहीं हूं।

आरोप लगाने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के जाहिरा संकेत देते हुए रमेश ने कहा, आपको मदद की जरूरत है।

जनसुनवाई में तीखी बहस होने पर मंत्री ने चर्चा को कुछ अनुशासित करने के लिये कभी अपने प्राधिकार का इस्तेमाल किया, तो विरोध के स्वर शांत करने के लिये कभी़़़कभी अपने व्यंग्यपूर्ण लहजे का भी सहारा लिया।

जब एक जनसुनवाई में एक व्यक्ति चिल्लाकर अपनी बात कहने की कोशिश कर रहा था तो मंत्री ने कहा, यह संसद नहीं है। रमेश ने यहां तक कहा, संसदीय कार्यवाही का प्रसारण रोक देना चाहिये। यह काफी संक्रामक है।

जब रमेश पर यह आरोप लगा कि वह आनुवांशिक तौर पर संवर्धित बीज तैयार करने वाले खेमों के जाल में फंसे हैं तो मंत्री ने कहा, मैं बेलगाम आरोपों को कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा।

केंद्रीय कैबिनेट भी इस मुददे पर विभाजित नजर आयी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री पथ्वीराज चव्हाण और कषि मंत्री शरद पवार बीटी बैंगन की व्यावसायिक खेती के पक्ष में दिखे। पवार ने कहा कि जब आनुवांशिक अभियांत्रिकी मंजूरी समिति :जीईएसी: बीटी बैंगन को हरी क्षंडी दिखा चुकी है तो सरकार की कोई भूमिका नहीं रह जाती।

इस पर रमेश ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अंतिम मंजूरी पर्यावरण मंत्रालय को ही देनी है। राज्य सरकारें, नेता, वैज्ञानिक और गैऱ़सरकारी संगठन भी बीटी बैंगन के मुददे पर बंटे नजर आये। आलोचना इस पर आधारित थी कि अगर बीटी बैंगन की खेती की मंजूरी दी गयी तो इससे देश की जैव विविधता नष्ट हो जायेगी और उन सभी आनुवांशिक तौर पर संवर्धित फसलों के उत्पादन के लिये रास्ते खुल जायेंगे जो अभी परीक्षण के विभिन्न दौर में ही हैं।

बीटी बैंगन के उत्पादन के लिये मिटटी के जीवाणु बेकिलस थुरिनजेनेसिस :बीटी: के जरिये विषैले जीन क्राय़़़1 एसी को आनुवांशिक अभियांत्रिकी तकनीक का इस्तेमाल कर बैंगन के पौधे में डाला जाता है। महाराष्ट्र हाइब्रिड सीडस कंपनी इस फसल को तकनीकी मदद के साथ विकसित कर रही है।

 
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