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दस वर्ष बीत चुके हैं लेकिन साइबेरियाई क्रेनों (बगुलों) ने भारत का रुख नहीं किया है।
दस वर्ष बीत चुके हैं लेकिन साइबेरियाई क्रेनों (बगुलों) ने भारत का रुख नहीं किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हर वर्ष सदिर्यो में भारत आने वाले ये पक्षी अब शायद कभी इधर का रुख नहीं करेंगे।
साइबेरियाई बगुलों को संरक्षित पक्षी का दर्जा प्राप्त है। हर वर्ष राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव पक्षी अभ्यारण्य आने वाले ये पक्षी अब शायद साइबेरिया (रूसी क्षेत्र) से भारत तक का अपना सदियों पुराना रास्ता बदल चुके हैं।
बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के पक्षी विज्ञानी दिलावर मोहम्मद ने बताया कि केवलादेव पक्षी अभ्यारण्य में कई वर्षों से साइबेरियाई बगुलों को नहीं देखा गया है। भरतपुर ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी इन्हें नहीं देखा गया है। इससे साफ है कि उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया है। इसके कई कारण हो सकते हैं।
साइबेरियाई बगुलों को अंतिम बार 2001 में भरतपुर में देखा गया था। मोहम्मद ने कहा कि पक्षी प्रेमियों, पक्षी विज्ञानियों और पर्यटकों के लिए यह बहुत बुरी खबर है। ये राजसी पक्षी लोगों के आकर्षण का केंद्र होते थे।
मोहम्मद बताते हैं कि साइबेरियाई बगुले अफगानिस्तान के रास्ते भारत पहुंचा करते थे। एक युवा साइबेरियाई क्रेन की ऊंचाई 91 इंच और वजन 10 किलो तक हो सकता है।
वर्ष 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों द्वारा जा रही गोलीबारी और बमबारी के बीच साइबेरियाई बगुले अंतिम बार अफगानिस्तान के रास्ते भारत पहुंच थे। उसके बाद से उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं देखा गया है। इससे साफ है कि उन्होने अपने शीतकालीन प्रवास के लिए किसी और स्थान का चयन कर लिया है।

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