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राजनीति व धर्म का घालमेल खतरनाक: लिब्रहान
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:24-11-09 03:02 PM
Last Updated:24-11-09 05:56 PM
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बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के मामले की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग ने राजनीति से धर्म के मेल पर कड़ी आपत्ति करते हुए सिफारिश की है कि राजनीतिक सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से इस तरह के दुरुपयोग के लिए कड़े दंड का प्रावधान करने वाला कानून बनना चाहिए।

आयोग की भारी भरकम रपट मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने पेश की। न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिब्रहान की अध्यक्षता वाले आयोग ने 17 जून को अपनी रपट सरकार को सौंप दी थी।

आयोग की रपट के साथ पेश 13 पृष्ठ की कार्रवाई रपट (एटीआर) में कहा गया है कि सरकार ने आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं और वह दंगों को नियंत्रित करने के लिए सांप्रदायिक हिंसा विधेयक लागू करने का इरादा कर रही है। साथ ही उसका ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए विशेष अदालतों के गठन का भी इरादा है।

एटीआर में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह सहित भाजपा के शीर्ष नेताओं और संघ परिवार से जुड़े़ संगठनों के नेताओं के दोषी पाए जाने का कोई उल्लेख नहीं है।

आयोग का गठन अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाये जाने की घटना के दस दिन बाद किया गया था। आयोग ने कहा कि धर्म को राजनीति से अलग करने की संवैधानिक अवधारणा का उद्देश्य शासन और धर्म को अलग करना है।

आयोग ने कहा कि जहां राजनीति में नैतिकता और सदाचार के कुछ पहलुओं को समाहित करना उपयोगी और अपेक्षित है, वहीं धर्म, जाति या क्षेत्रीयता का इस्तेमाल प्रतिगामी और खतरनाक रुझान है, जो जनता को अलग थलग करने और उन्हें छोटे छोटे वर्गो में बांटने की क्षमता रखता है।

न्यायमूर्ति लिब्रहान ने कहा कि छह दिसंबर 1992 की घटना और उसके बाद की कई घटनाओं ने पहले ही देश को दिखा दिया है कि धर्म और राजनीति को मिलाना कितना खतरनाक और विध्वंसकारी है। उन्होंने कहा कि राजनीति के अपराधीकरण या धर्म के राजनीति से मेल के जरिए सत्ता हासिल कर लोकतांत्रिक मसलों में हस्तक्षेप करना आज सामान्य बात हो गई है।

आयोग ने कहा कि धर्म, जाति के दुरुपयोग के लिए कड़े दंड के प्रावधान वाला पृथक कानून बनना चाहिए। राजनीति फायदे या राजनीति या सत्ता को अवैध रूप से हथियाने से रोकने के लिए ऐसा कानून बने। रपट में कहा गया कि ऐसे कानून के प्रभावशाली कार्यान्वयन और मुकदमे की तेजी से कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए देश के चार कोनों में क्षेत्रीय न्यायाधिकरण बनने चाहिए।

एटीआर में कहा गया कि आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं और सांप्रदायिक हिंसा (रोकथाम, नियंत्रण एवं पीड़ितों के पुनर्वास) विधेयक लाना उनमें से एक है, जिसमें विशेष अदालतों के गठन के प्रावधान है। जहां तक बाबरी मस्जिद ढ़हाये जाने के सिलसिले में हुए मामलों का सवाल है, एटीआर में रायबरेली की विशेष अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ दायर मामलों और 47 अन्य मामलों का उल्लेख है और अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ भी एक मामला है। इन मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए कदम उठाये जाएंगे।

एटीआर ने हालांकि आयोग की इस सिफारिश को अव्यवहारिक बताते हुए नामंजूर किया है, जिसमें राष्ट्रीय एकता परिषद को वैधानिक अधिकार देने और उसके सदस्यों को किसी संवैधानिक पद पर या लाभ के पद पर या सार्वजनिक पद पर बने रहने से प्रतिबंधित करने की बात है।

आयोग ने आपराधिक न्याय आयोग के गठन का सुझाव दिया, जो सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रदर्शन की व्यापक निगरानी करेगा और जरूरत पड़ने पर सुधारात्मक उपाय सुझाएगा। सरकार ने कहा कि विधि आयोग से आपराधिक न्याय आयोग के गठन की आवश्यकता का अध्ययन करने का आग्रह किया जाएगा।

आयोग की एक अन्य सिफारिश सांप्रदायिक हिंसा से कठोरता से निपटने से जुड़ा है। आयोग ने कहा कि राज्य आपराधिक जांच एजेंसियों के तहत एक विशेष जांच दस्ता बनना चाहिए और दंगों के दौरान सांप्रदायिक अपराधों और हिंसा की कठोरता से जांच होनी चाहिए। इसने कहा कि सांप्रदायिक दंगों से जुड़े आरोपों को हटाने का अधिकार सरकार को नहीं मिलना चाहिए।

 
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