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तमस को जिया था भीष्म साहनी ने
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:07-08-12 03:50 PM
Last Updated:07-08-12 03:53 PM
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आज से करीब 65 साल पहले देश के विभाजन का दर्द सहने वाले भीष्म साहनी ने जब अपने अनुभवों को तमस के रूप में शब्दों में बांधा, तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनकी इस रचना की प्रासंगिकता वर्तमान हालात में और बढ़ चुकी होगी।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के पूर्व निदेशक देवेन्द्र राज अंकुर ने कहा कि देश के विभाजन की पीड़ा वही समझ सकता है जिसने विभाजन का दंश सहा हो। इस विभाजन के कड़वे अनुभवों को भीष्म साहनी ने बेहद ही प्रामाणिक और मार्मिक तरीके से तमस में शब्दों में बांधा है।

उन्होंने कहा एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस करीब है और विभाजन का दर्द फिर ताजा हो रहा है। मैं मानता हूं कि हिन्दी, उर्दू और पंजाबी में विभाजन पर जितनी भी रचनाएं आईं, भीष्म साहनी की तमस का उनमें विशिष्ट स्थान है। दिलचस्प बात यह है कि विस्थापन की त्रासदी शब्दों में दर्ज कर भीष्म ने काफी पहले, 1974 में पेश किया था लेकिन जब गोविंद निहालानी ने 1987 में इस पर धारावाहिक बनाया तो विवाद उठ खड़ा हुआ।

रंगमंच के जाने-माने चेहरे राकेश नैयर ने कहा विवादों ने भीष्म साहनी की इस रचना के पक्ष में ही काम किया। यह सब तो भीष्म साहनी ने खुद पर भुगता था। हम तो उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो आजाद हवा में सांस ले रही है। हमें अपना घर अपना शहर छोड़ने में दर्द महसूस होता है। लेकिन एक पीढ़ी ने तो अपना देश, घर बार, अपने अपनों को और न जाने क्या क्या छोड़ा। खुद को उनकी जगह रख कर सोचें तो दिल दहल जाता है।

देवेंद्र राज अंकुर ने कहा कि अमेरिका के विस्कोन्सिन स्थित गुरुद्वारे में गोलीबारी की घटना हुई है जो बढ़ती असहिष्णुता बताती है। दिन पर दिन खतरनाक होते हालात में तमस और अधिक प्रासंगिक हो गई है। भीष्म को प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला रचनाकार माना जाता है। लेकिन तमस उन्हें बहुत अलग दर्जा देती है और इसके लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे।

भीष्म साहनी का जन्म आठ अगस्त 1915 को रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। फिर उनका परिवार लाहौर में रहने लगा। विभाजन के बाद वह भारत आ गए। बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में साहनी ने भारत आने की परिस्थिति का उल्लेख किया था।

उन्होंने कहा था जब दिल्ली में स्वाधीनता समारोह होने जा रहा था तब मैं रावलपिंडी छोड़कर दिल्ली आया था सिर्फ यह देखने के लिए कि लाल किले पर झंडा फहराएंगे पंडित नेहरू और हिंदुस्तान की आजादी का जश्न होगा। मैं तो जश्न देखने आया था इस इरादे से, कि हफ्ते भर बाद लौट जाऊंगा, लेकिन जब दिल्ली पहुंचा तो पता चला कि गाड़ियां बंद हो गयीं और फिर मेरा लौटना नामुमकिन हो गया।

इस तरह यहीं बस गया तमस का रचनाकार। अपने अक्षरों से साहित्य को समृद्ध करने वाले भीष्म ने 11 जुलाई 2003 को अंतिम सांस ली।

 
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