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भारत के बिना दुनिया की नहीं चलेगी गाड़ी: बुश
विशेष प्रतिनिधि नई दिल्ली
First Published:30-10-09 08:35 PM
Last Updated:30-10-09 08:48 PM
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हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में अमेरिका की ताजा चुनौतियों पर अपना नजरिया पेश करने आए जार्ज बुश के स्टाफ ने इंटरव्यू से पहले एक बात साफ कर दी थी। यह कि ओबामा सरकार के कामकाज के बारे में कोई भी सवाल नहीं पूछा जाएगा क्योंकि अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपतियों द्वारा वर्तमान राष्ट्रपति की आलोचना का रिवाज नहीं है। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था कि आधा घंटे तक बात हो और उसमें अप्रत्यक्ष रूप से ओबामा सरकार का जिक्र न आए। देखिए बातचीत के सिलसिले ने कहां-कहां कैसे ओबामा प्रशासन के कामकाज को छुआः
 
आपके वक्त में भारत और अमेरिका के बीच एक शानदार और ऐतिहासिक जुगलबंदी उभरी। क्या आपको लगता है कि इधर या उधर की सरकार बदलने के बावजूद यह जुगलबंदी जारी रहेगी?
बिल्कुल। मुझे पूरी उम्मीद है कि राष्ट्रपति ओबामा उन नीतियों को जारी रखेंगे। वे अपने हाल के भाषणों में ऐसा कह भी चुके हैं। ओबामा ही क्यों, मुझे लगता है कि भविष्य में अमेरिका के सभी राष्ट्रपति यह पहचानेंगे कि भारत एक भरोसेमंद पार्टनर है। ग्लोबल चेंज का पहिया है। मैंने बहुत विश्वास के साथ जी-8 का आकार बढ़ाकर भारत को उसमें शामिल करने की पैरवी की थी। मेरी दलील थी कि वित्तीय संकट का निदान भारत जैसी विराट अर्थव्यवस्थाओं को शामिल किए बिना नहीं हो सकता। सोचिए क्या आज से 20 साल पहले कोई विश्व नेता भारत के बारे में इतनी उम्मीद जता सकता था? लेकिन आज मेरी बात सच साबित हो रही है। इतिहासकार जब पीछे मुड़कर देखेंगे तो हैरान होंगे कि इक्कीसवीं सदी के पहले दशक की मंदी से उबारने में भारत जैसे मुल्कों ने कितना बड़ा योगदान दिया।
लेकिन आज आप भारत-अमेरिका संबंधों की दशा-दिशा को कैसे देखते हैं?
मुझे लगता है कि अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों के दौर में हमें उदारता बरतने की जरूरत है। अमेरिकी उद्यमियों को भारतीय मध्यवर्ग की सख्त जरुरत है। भारत के पास ब्रेन पावर है। यह एक नॉलेज इकॉनमी है। अमेरिका को उसके स्टूडेंट्स से फायदा होता है। वे अमेरिकी अर्थतंत्र में रचनात्मक भूमिका निभाते हैँ। लिहाजा इमीग्रेशन पॉलिसी को लचीला होना चाहिए। हमें उन्हें और वीजा देने चाहिए। (गौरतलब है कि ओबामा प्रशासन की हाल में एच वन वीजा का कोटा कम करने के लिए खासी आलोचना हुई थी।)
आपके कार्यकाल में अमेरिकी विदेशनीति में भारत एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना रहा। खासतौर पर एटमी करार के सिलसिले में। भारत तो ग्लोब पर हमेशा मौजूद था, अमेरिका ने उसकी अहमियत समझने में किसी बुश के राष्ट्रपति होने तक इंतजार क्यों किया?
वास्तव में मैं भारत के साथ संबंध बढ़ाने का हिमायती तब से हूं जब मैं राष्ट्रपति बना भी नहीं था। मैं भारतीय लोकतंत्र के कुछ गुणों पर हमेशा मुग्ध रहा हूं। यह एक गौरवशाली डेमोक्रेसी है जो दुनिया में इस बात की साक्षात मिसाल बनकर खड़ी है कि 14 करोड़ मुस्लिमों के साथ एक हिन्दुबहुल राष्ट्र किस तरह शांति के साथ रह सकता है। भारत की धर्मनिरपेक्षता, उसकी विविधता, अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की आजादी, जिस किसी की पूजा की आजादी - ये सब किसी भी सभ्यता के सर्वश्रेष्ठ मूल्य हैं। मुझे लगता है भारत और अमेरिका सिर्फ और सिर्फ इसीलिए स्वाभाविक मित्र (नेचुरल एलाइज) हैं कि वे एक जैसे मूल्यों में विश्वास रखते हैं। ये मूल्य उन लोगों के खिलाफ हैं जो अपनी विचारधारा की खातिर निदरेष लोगों का खून बहाने में यकीन रखते हैं। जहां तक बात एटमी करार की है, तो वह इस मायने में ऐतिहासिक है कि तब से भारत के मायने बदल गए। भारत को अमेरिका ने एक बिलकुल नई रोशनी में देखा। एटमी डील ने भारत को उसकी पुरानी छवि के चंगुल से आजाद कर दिया।
पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसे अमेरिका किस तरह देखता है?
मैं सबसे पहले यह साफ करना चाहता हूं कि अमेरिका एक ही वक्त में भारत और पाकिस्तान दोनों से अच्छे संबंध रख सकता है और यह मुमकिन है। पाक की ताजा घटनाएं सिर्फ यही रेखांकित कर रही हैं कि आतंकवादी हमलों का जितना खतरा पाकिस्तान से बाहर है उतना ही उसके अंदर भी है।
मौजूदा मंदी की जड़ें अमेरिका के हाउसिंग लोन सेक्टर में बताई जाती हैं। क्या अब जाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में फिर से कुछ जान लौटती नजर आ रही है? सुधार के कुछ अंकुर फूटे क्या?
मुझे उम्मीद तो है। इधर खत्म हुई तिमाही में जीडीपी में ग्रोथ दर्ज हुई है। लेकिन यहां बता दूं कि अकेला हाउसिंग लोन सेक्टर जिम्मेवार नहीं था। दरअसल मंदी के पीछे सरकारी गारंटी वाली सिक्योरिटीज के बाजार का भी हाथ था, जिसको रेगुलेट करने की नाकाम कोशिश मेरी सरकार ने कांग्रेस में की थी। जिम्मेवारी  वाल स्ट्रीट की उन अति उत्साही वित्तीय कंपनियों की भी है जिन्होंने ट्रेड सरप्लस के पैसे के बूते ऐसे ऐसे जटिल वित्तीय उत्पाद बाजार में उतार दिए जिन्हें समझना खुद उनके लिए मुमकिन नहीं था। ऐसी सैंकड़ों दूसरी चीजें भी थीं जो एक साथ मिलकर गुब्बारे के फूटने का सबब बनीं।
उम्र और कॅरियर के इस मुकाम पर फिट रहने के लिए क्या करते हैं? क्या दौड़ने का वक्त निकाल पाते हैं?
देखिए 63 की उम्र में गठिया जैसी चीजें घेर लेती हैं। दौड़ना बहुत अच्छा है लेकिन वह जरा मुश्किल पड़ता है। हां, माउंटेन बाइकिंग अब भी कुछ बेहतर मालूम होती है। बशर्ते आदमी फिसलने और गिरने से बचा रहे। आप तो जानते हैं मैं एक बार भुगत चुका हूं।

 
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