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घूंघट और घर की दहलीज लांघकर ये हाथ अब काम मांगने आए हैं। गरीबी और बेकारी इनको जीने नहीं दे रही थी। अब अपने हाथों से खुद तकदीर संवारने का फैसला लिया है। खुद खड़ी हुई हैं तो सरकारी मशीनरी भी साथ देने को राजी हो गई है। साथ में वे एनजीओ भी आ गए हैं, जिनको अपने लिए मुद्दे नहीं मिल रहे थे। अब सब मिलकर खुशहाली की राह तय करेंगे।
मोदीनगर की राधा अभी बहुत मुश्किल में हैं। पति कुछ नहीं करता। बच्चाे हैं, बड़ा परिवार है। खाने तक संकट है। कुछ ऐसी ही कहानी मोदीनगर की दीपा, लोनी की नरगिस, भोजपुर की चमेली की भी है। सबके परिवार घोर गरीबी से जूझ रहे हैं। बच्चे पढ़ नहीं पा रहे। खानदान में बेटियों की शादी नहीं हो पा रही।
खुद रोजगार की इच्छुक महिलाओं की मदद को प्रशासन ने मंगलवार को विकास भवन में ‘सुनवाई’ कार्यक्रम कराया था। लक्ष्मी संस्थान नाम के एनजीओ ने गांव-गांव महिलाओं को प्रेरित किया। इसके बाद तो बाद मोदीनगर, भोजपुर और लोनी के कुछ गांव से ही सैकड़ों की तादाद में महिलाएं यहां पहुंच गई। ज्यादातर अनपढ़ और घूंघट रखने वाली थीं मगर जब हाथों को काम और रोजगार मिलने की उम्मीद बंधी तो फिर किसी ने झिझक नहीं दिखाई।
एनजीओ सचिव नीलम त्यागी के मुताबिक, ऐसे तमाम महिलाओं को जोड़कर अब तक जिले में 60 ऐसे समूह खड़े किए जा चुके हैं, जो कैंचुआ खाद बनाने का काम कर रहे हैं। प्रभारी डीएम जुहैर बिन सगीर बताते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाओं का आगे आना अच्छा संकेत है। प्रशासन ऐसे सभी महिलाओं को स्वयं सहायत समूह बनाकर रोजगार दिलाने की कोशिश में लग गया है। जल्द ये महिलाएं हाथों से भूमिहीन गरीब महिलाएं हाथों से मछली के जाल बुनने, अचार बनाने, मुर्गी पालन, सुअर पालन कर अपने पैरों पर खड़ी दिखाई देने लगेंगी।

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