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पेट्रोल और डीजल से कर घटाओ
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:28-05-12 05:50 PM
भारतीय उद्योग एवं वाणिज्य मंडल (एसोचैम) ने कहा है कि सरकार को पेट्रोल और डीजल पर कर मूल्य के आधार पर नहीं बल्कि मात्रा के आधार पर वसूलना चाहिए। उद्योग संगठन ने पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के देश व्यापी विरोध के बीच कहा है कि पेट्रोल पर करों का अत्यधिक बोझ है और केंद्र और राज्य सरकारों को इसमें कटौती करनी चाहिए।
पेट्रोल और डीजल न केवल मोटर वाहनों को चलाते हैं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए ईंधन का काम करते हैं। घरेलू अर्थव्यवस्था फिलहाल कडी चुनौतियों का सामना कर रही है। इसलिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों के संबंध में कोई भी फैसला सोच समझकर किया जाना चाहिए। एसोचैम के अध्यक्ष राजकुमार धूत का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों को ईंधन के कर ढांचे में सुधार करते हुए पेट्रोल और डीजल के दाम कम करने के लिए शुल्कों में कटौती करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि तेल कंपनियों को घाटा सहने के लिए नहीं छोडा जा सकता और सरकार भी हमेशा सब्सिडी जारी नहीं रख सकती। उपभोक्ताओं पर भी सारा भार डालना संभव नहीं है। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को पेट्रोल और डीजल पर से करों में कटौती करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले करों को ढांचा बदला जाना चाहिए। मौजूदा समय में पेट्रोल और डीजल के खुदरा मूल्य पर कर लगाए जाते हैं। इसलिए जब भी तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल के मूल्य में वृद्धि करती हैं तो केंद्र और राज्य सरकार के राजस्व में अपने आप बढ़ोतरी हो जाती है। इसका सीधा असर उपभोक्ता पर पड़ता है। धूत ने कहा कि कर ढांचा मूल्य आधारित नहीं बल्कि मात्रा आधारित होना चाहिए। इसिलए कर का आधार प्रति लीटर पेट्रोल या डीजल होना चाहिए। सरकार पेट्रोल उत्पादों से प्रतिवर्ष 1.03 लाख करोड़ रुपए कर के रूप में एकत्र करती हैं जोकि कुल एकत्रित कर का 16 प्रतिशत है।
उन्होंने कहा कि तेल कंपनियों को घाटा सहने के लिए नहीं छोडा जा सकता और सरकार भी हमेशा सब्सिडी जारी नहीं रख सकती। उपभोक्ताओं पर भी सारा भार डालना संभव नहीं है। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को पेट्रोल और डीजल पर से करों में कटौती करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले करों को ढांचा बदला जाना चाहिए। मौजूदा समय में पेट्रोल और डीजल के खुदरा मूल्य पर कर लगाए जाते हैं। इसलिए जब भी तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल के मूल्य में वृद्धि करती हैं तो केंद्र और राज्य सरकार के राजस्व में अपने आप बढ़ोतरी हो जाती है। इसका सीधा असर उपभोक्ता पर पड़ता है। धूत ने कहा कि कर ढांचा मूल्य आधारित नहीं बल्कि मात्रा आधारित होना चाहिए। इसिलए कर का आधार प्रति लीटर पेट्रोल या डीजल होना चाहिए। सरकार पेट्रोल उत्पादों से प्रतिवर्ष 1.03 लाख करोड़ रुपए कर के रूप में एकत्र करती हैं जोकि कुल एकत्रित कर का 16 प्रतिशत है।
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