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विक्रमशिला महाविद्यालय का इतिहास पढ़ें, आज से शुरू है महोत्सव

विक्रमशिला महाविद्यालय का इतिहास पढ़ें, आज से शुरू है महोत्सव

विक्रमशिला महाविद्यालय, देखिए बौद्ध शिक्षण केंद्र के गौरवशाली अतीत के अवशेष। भागलपुर के कहलगांव अनुमंडल के अंतीचक गांव के निकट प्राचीन विक्रमशिला महाविहार का विशाल उत्खनित क्षेत्र अवस्थित है।

बौद्ध शिक्षा के महान शिक्षण केंद्र की स्थापना 8वीं शताब्दी में पाल वंश के शासक धर्मपाल ने की थी। राजकीय संरक्षण प्राप्त इस महाविहार में कई विषयों की पढ़ाई होती थी जिसके लिए दूर-दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे।

विक्रमशिला के प्रकांड विद्वान शिक्षकों में दिपांकर ज्ञान श्री अतिस, रत्नवज्र, रत्नाकर, जेटारी, बुद्ध ज्ञानपाद, वैरोचन, रक्षित, अभयंकर गुप्त सरीखे लोग शामिल हैं। विक्रमशिला में द्वार परीक्षा की प्रथा थी। प्रवेश पानेवाले शिक्षार्थियों को द्वार पंडितों द्वारा ली जानेवाली कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता था। 

राजकीय संरक्षण प्राप्त विक्रमशिला आवासीय विश्वविद्यालय था जहां छात्रों के नि:शुल्क रहने, खाने पीने और शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा थी। वर्ष 1960 में पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो0 बी पी सिन्हा के नेतृत्व में 50 शिक्षकों और छात्रों की टीम ने करीब दस वर्षों तक विभिन्न चरणों में खुदाई की जिसमें महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए। इसके बाद भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग की ओर से वर्ष 1972 से लेकर 1982  दस वर्षों तक खुदाई का काम चला।

करीब 100 एकड़ के अधिग्रहित क्षेत्र में की गई खुदाई में मुख्य स्तूप, मनौती स्तूप, तिब्बती धर्मशाला, छात्रावास परिसर, वातानुकुलित पुस्तकालय, प्रवेश द्वार, ध्यान कक्षों के अलावा हिन्दु मंदिर के स्थाई अवशेष प्राप्त हुए। खुदाई के क्रम में करीब छह हजार से अधिक चलंत अवशेष मिले जिनमें से करीब 400 की संख्या में अवशेषों को विक्रमशिला पुरातात्विक संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। बांकि अवशेष स्कल्पचर शेड में रखे गये हैं।

यह विहार भिक्षुओं के निवास के लिये विशाल वर्गाकार संरचना है जिसकी प्रत्येक भुजा 330 मीटर है। इसके केंद्र में ईंटों से निर्मित एक स्तूप निर्मित है जिसका आधार एक क्रॉस के समान है। उत्तरी भुजा के मध्य में प्रवेश द्वार है। मुख्य द्वार से लगभग 70 मीटर पूर्व एक गुप्त द्वार है। विहार की दक्षिणी भुजा पर एक संकरे मार्ग हैं। मुख्य स्तूप के चारो ओर छात्रावास के 208 कमरे हैं। उक्त सारे कमरे बरामदे से जुड़े हैं।

केंद्र में स्थित स्तूप तथा मुख्य द्वार की सीध में उत्तर की ओर एक लघु द्वार भी है। दोनों द्वारों के बीच प्रस्तर से निर्मित मनौती स्तूप का समूह है। भव्य विन्यास की दृष्टि से विक्रमशिला महाविहार पहाड़पुर, बांग्लादेश स्थित सोमपुर महाविहार से मिलता जुलता है। खुदाई में मिली राख की परत से इस बात को बल मिलता है कि 12वीं शताब्दि में बख्तियार खिलजी ने इसे नेस्तनाबूद कर डाला था। 

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  • Web Title:history of vikramshila mahavidyalaya situated in bhagalpur