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पिछले कदमों पर अमल की चुनौती

कोपेनहेगेन क्लाइमेट कांफ्रेंस से पूर्व भारत ने स्वेच्छा से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 2020 तक 20-25 फीसदी की कटौती का ऐलान किया था। अब कोपेनहेगन समझौते के तहत इसे अमलीजामा पहनाया जाना है। इसलिए नए वर्ष में इस दिशा में कई ठोस पहल किए जाने के आसार हैं। इसमें शुरू से ही उन प्रावधानों, कदमों पर फोकस रखना होगा जो पर्यावरण के अनुकूल हैं। दूसरे, इसी साल अक्तूबर में दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेल होने हैं, इसलिए बड़ी चुनौती वाहनों के धुएं को थामने की है। अहम प्रश्न है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की सघनता में कमी कैसे आए? खासकर तब जबकि औद्यौगिकीकरण तेजी से बढ़ रहा है। 40 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं। उनकी आय बढ़ाने के लिए हमें उद्योगों की जरूरत है। शहरीकरण बढ़ रहा है। ऐसे में सरकार को ऊर्जा सघनता को काबू रखने वाले कदमों पर अमल शुरू करना है। कानूनी प्रावधानों के जरिए इन्हें सरकार लागू करने की पहल करने की प्रतिबद्धता जाहिर भी कर चुकी है। सरकार ने कई मोर्चो पर इसकी तैयारी की है। पहले चरण में सभी वाहनों के लिए फ्यूल एफीशिएंसी स्टैंडर्ड तैयार किए जा रहे हैं। इन्हें हालांकि 2010 के अंत तक पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत ऐसी तकनीक के वाहनों को बढ़ाया जाएगा जिसमें ऊर्जा की खपत कम हो। वाहनों से कार्बन उत्सर्जन सर्वाधिक होता है। ऊर्जा सघनता को कम करने के लिए वाहनों की तकनीक में सुधार जरूरी है।

भवनों में एनर्जी की खपत काफी होती है। इसलिए भवनों के डिजाइन में आमूल बदलाव कर उन्हें एनर्जी एफिशिएंट बना ऊर्जा की खपत कम की जाएगी। इसके लिए एनर्जी कंजर्वेशन बिल्डिंग कोड बनाकर पूरे देश में लागू किया जाएगा। 2010 में ऊर्जा मंत्रलय एनर्जी कंजर्वेशन एक्ट में संशोधन करने जा रहा है। इसमें उद्योगों को नई तकनीक अपना कर ऊर्जा की खपत घटाए जाने के कानूनी प्रावधान अमल में लाने होंगे। ऊर्जा की खपत घटाने वाली इकाइयों को प्रोत्साहित करना होगा। ऊर्जा खपत कम करने वाली एजेंसियों को कार्बन ट्रेडिंग का मौका मिलेगा। वन क्षेत्रफल में इजाफे की चुनौती भी सरकार के समक्ष है। 33 फीसदी वन क्षेत्रफल के मुकाबले हमारा वन क्षेत्रफल सिर्फ 21 फीसदी है। इस दिशा में पहल हो चुकी है। राज्यों को कंपेन्सेटरी रिफॉरेस्टेशन फंड दिया जा रहा है। दूसरे, वन मंत्रलय ने सघन वनों में खनन कार्य पर रोक का  निर्णय किया है। यहां बता दें कि हमारे कार्बन उत्सर्जन का करीब 11 फीसदी हिस्सा वन सोखते हैं ये और बढ़े तो ज्यादा कार्बन सोखेंगे। आगामी वर्ष में कोयला बिजली घरों में क्लीन कोल टेक्नोलॉजी का प्रयोग होगा। कोयले के बिजलीघर कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण हैं। लेकिन कोयले से बिजली बनाना बंद नहीं  हो सकता, अलबत्ता ग्रीन तकनीकी से इसे कम किया जाएगा। कई और मोचरे पर भी कदम बढ़ेंगे। मसलन, गंगा बेसिन अथॉरिटी बन चुकी है। बजट में गंगा स्वच्छता हेतु 15 हजार करोड़ की योजना को स्वीकृति मिलेगी। नेशनल एन्वायरनमेंट अथॉरिटी बन रही है जो प्रदूषण की रोकथाम पर नजर रखेगी। पर्यावरण विवाद निपटारे के लिए ग्रीन ट्रिब्यूनल बनाने की प्रक्रिया चल रही है जो संभवत: इस साल तैयार हो जाएगी। 

 

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