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राजेंद्र अवस्थी : काल चिंतन के चितेरे

नई कहानी धारा के लेखकों में ख्यात राजेंद्र अवस्थी ने ‘लमसेना’ जैसी कहानियां लिखकर हिंदी कहानी को एक ऐसे लोक से परिचित कराने के साथ किया जिसका लोक जीवन दुनिया के लिए विस्मय की चीज़ बना। बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों का वह लोक समुदाय नृवंशशास्त्रीय समाजशास्त्रीय, फिल्मकारों और रंगकर्मियों के लिए भी एक उर्वर भूमि बना। इसी समकाल में वैरियर एल्विन के अध्ययन और फिर इन अछूते क्षेत्रों में शिक्षा, सामुदायिक किस्म के प्रजातांत्रिक कार्यक्रम इस तेजी से चलने लगे कि राजेंद्र अवस्थी आदिवासी आंचलिक कथाकार के रूप में विख्यात होने लगे।

पत्रकार के रूप में नागपुर के नवभारत से यात्रा करनेवाले राजेंद्र अवस्थी का दूसरा पड़ाव उस काल का बंबई और आज का मुंबई बना। हिंदी की बहुचर्चित कथापत्रिका सारिका के संपादन से राजेंद्र अवस्थी का जुड़ाव हुआ और बाद में वे दिल्ली चले आए। उस काल के प्रसिद्ध साहित्यकारों से उनके घने संबंध बने। धर्मयुग के संपादक और कथाकार धर्मवीर भारती ने ‘कथादशक’ की योजना द्वारा नई कहानी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाने का कार्य किया। राजेंद्र अवस्थी का ‘मछली बाज़ार’ उपन्यास मुंबई पर दूसरा उपन्यास था जिसने हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस बीच राजेंद्र अवस्थी दिल्ली आ गए और बच्चों की पत्रिका के संपादन के बाद कादम्बिनी का संपादन संभाला। इस दौरान राजेंद्र अवस्थी देश-विदेश के साहित्य को देशी और विदेशी अनुवादकों के सहारे अपने स्तर पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाते रहे।

राजेंद्र अवस्थी लेखकों की भारतीय संस्था आथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से जुड़े और विनोदपूर्वक लोग टिप्पणी करते रहे कि उन्होंने उसे जेबी संस्था बना डाला किंतु श्रीमान केकर, डॉ कर्ण सिंह, डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी जैसी हस्तियों को उन्होंने भारतीय लेखकों की शीर्ष संस्था से जोड़े रखा। आजकल प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ बिंदेश्वर पाठक इससे जुड़े हुए हैं। राजेंद्र अवस्थी की अपनी प्रकृति भारत को उसके अछूते पक्षों की मार्फत जानने की जिस रूप में विकसित हुई, आज उस पर बहस की जा सकती है। परंतु अब तक वैज्ञानिक आधारों पर न तौले गए पक्षों को उन्होंने अपनी पत्रिका में जगह दी। कभी कभी उन्होंने झूठे दावेदारों का पर्दाफाश भी किया परंतु उनकी छवि तंत्र-मंत्र के विषम जाल को जनोन्मुख बनाने वाले संपादक के रूप में निर्मित हो गई।

राजेंद्र अवस्थी भरसक उस मिथक को तोड़ने की कोशिश करते रहे किंतु वे एक ऐसे अभिनेता के रूप में विख्यात हो गए जो अपने एक आदर्श चरित्र के रूप में ढल जाता है। इन पंक्तियों के लेखक को राजेंद्र अवस्थी के साथ देश-विदेश में एक साथ जाने का मौका मिला और उस दौरान विलक्षण किस्म के अनुभव हुए। पहला तो यही कि जब अवस्थी जी से कहा जाता कि ‘मित्रवर अगर आपके चार प्रशंसक हैं तो चार हज़ार आलोचक भी हैं।’ तो वे उत्तर देते ‘नाम लेने वाले चार हजार चार’ लोग तो हैं।

आंकड़ों की इस दुनिया में वे अपने ढंग के खिलाड़ी थे। एक बार जब लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, जो लंदन में उच्चयुक्त थे, के आमंत्रण पर हम वहां थे तो एक रात अपने ठिकाने की दिशा भूल गए थे। उच्चयोग का विदेशी ड्राइवर पता नहीं खोज पाया तो अवस्थी जी ने कहा अरे वह वही जगह है जहां इक्यावन कारें बिक्री के लिए खड़ी थीं। अचरज नहीं होना चाहिए कि विदेशी ड्राइवर हमें उसी स्थान पर ले आया। अंकों, आंकड़ों और ज्योतिष की गणनाओं में रुचि रखने वाले अवस्थी दूसरी बहुतेरी चीजों में दिलचस्पी रखते थे किन्तु सबसे ज्यादा लगाव उन्हें शब्दों से था। उनका ‘काल चिंतन’ इस दृष्टि से गद्य का एक अनुपम लेखन है।

उनकी कृतियों के अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुए हैं। सोवियत संघ के अस्तित्व के दिनों राजेन्द्र अवस्थ अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुड़े और निकोलाई रोरिक के विचारों से प्रेरित ‘संस्कृति के द्वारा शांति’ के अभियान में लगी संस्था से सम्बद्ध हुए। पाठकों को याद होगा कि संस्कृति द्वारा शांति के अभियान की अनेक गतिविधियां विश्व भर में जारी हुईं और भारत में विशेष रूप में नग्गर (कुल्लू) तथा मध्य हिमालय के दूसरे क्षेत्रों में उसकी सक्रिय लहरी कारगर ढंग से संगोष्ठियों-संवादों के रूप में भारतीय और विदेशी रचनाकारों, कलाकारों और विद्वानों को अपनी ओर खींच लाई। सबके बीच जोड़ बैठाने का काम राजेन्द्र अवस्थी द्वारा सम्पन्न हुआ।

एक कथाकार, एक संपादक, एक आयोजक, एक अनुवादक के साथ-साथ एक चिन्तक के रूप में राजेन्द्र अवस्थी की भूमिका का अध्ययन अभी शेष है और अब उनके जाने के बाद इसकी जरूरी और संभावना बढ़ गई है, यह जानते हुए कि चार हजार चार के आंकड़े का गणित हमेशा बढ़ता ही रहता है।

लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं

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