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उत्तर प्रदेश में माया-मुलायम के सपने टूटे

उत्तर प्रदेश में बीते वर्ष को राजनीतिक समीकरणों के बिखराव और बहुजन समाज पार्टी तथा समाजवादी पार्टी के टूटते आधिपत्य के लिए याद किया जाएगा। प्रदेश की राजनीति के दो सबसे ताकतवर नेताओं बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के सपने टूटे, जबकि लोकसभा चुनाव में जोरदार वापसी से कांग्रेस के मन में नई आशा का संचार हुआ, मगर भाजपा सोती ही रह गई। लोकसभा चुनाव के परिणामों ने विधानसभा चुनाव के बाद उभरी उस तस्वीर को धुंधला कर दिया, जिसमें बसपा और सपा प्रदेश की राजनीति में मजबूत होते दिख रहे थे।

विधानसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों का 55 प्रतिशत इन दोनों दलों के खाते में गया था। इनमें बसपा को 30.46 और सपा को 25.45 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में इनके हिस्से क्रमशः 27 और 23 प्रतिशत से कुछ अधिक यानी 50 प्रतिशत मत ही आए। वहीं कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में मिले 8.5 प्रतिशत के मुकाबले लोकसभा चुनाव में 18 प्रतिशत से अधिक मत मिले, जबकि भाजपा को लगभग 17 प्रतिशत के मुकाबले 17.5 प्रतिशत मत मिले। इस बदलाव को राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने प्रदेश के मतदाताओं में क्षेत्रीय दलों के मुकाबले राष्ट्रीय दलों की तरफ बढ़ते झुकाव के रूप में देखा। प्रदेश की राजनीति में दो दशकों तक हाशिये पर रही कांग्रेस ने बढ़ते जनाधार के सहारे जोरदार वापसी की, मगर राष्ट्रीय राजनीति में उससे दो दो हाथ करने को तत्पर भाजपा चूक गई।

प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता उदयनारायण दीक्षित के अनुसार भाजपा इसका फायदा भले ही न उठा पाई हो, राष्ट्रीय दलों की तरफ मतदाताओं के बढ़ते रूझान से साफ है और पार्टी को आने वाले दिनों में इसका फायदा जरूर मिलेगा।

कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने भी राष्ट्रीय दलों की तरफ मतदाताओं के रूझान को शुभ बताते हुए कहा कि राहुल गांधी की मेहनत रंग लाई है और उत्तर प्रदेश की राजनीति में पार्टी की वापसी का ऐलान हो चुका है। प्रदेश की राजनीति में आए इस बदलाव ने बसपा सुप्रीमो मायावती को हिलाकर रख दिया, जो ढ़ाई वर्ष पहले हुए विधानसभा चुनाव पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्तारूढ़ होने के बाद अपनी सोशल इंजीनियरिंग के बल पर दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने का सपना देख रही थीं।

मायावती का सपना बेबुनियाद भी नहीं था, इसका कारण यह कि 403 सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनावों में उन्हें मिले 30.46 प्रतिशत वोट उन्हें प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से लगभग 55 सीटों पर जीतता हुआ दिखा रहे थे। मगर ढ़ाई वर्ष में मायावती के सुनहरे सपनों को ग्रहण लग गया, मत प्रतिशत 30 से 27 पर उतर आया और सीटे मिलीं कुल जमा बीस। दिल्ली के ताज पर नजरें टिकाए बैठीं बसपा सुप्रीमो मायावती की कसक का अंदाजा सहज की लगाया जा सकता है, जब लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने कहा कि बसपा विरोधी दल नहीं चाहते कि कोई दलित की बेटी देश की प्रधानमंत्री बने।

प्रदेश की राजनीति में मायावती के धुर विरोधी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी लोकसभा चुनाव में बड़ा दांव खेला। परमाणु करार के मुद्दे पर संकट में घिरी कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को ऐन मौके पर सहारा देकर कांग्रेस से दोस्ती करने के बाद सपा मुखिया यादव और उनके महासचिव अमर सिंह ने लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को प्रदेश में छोटे भाई की भूमिका देनी चाही। मगर जब बात नहीं बनी तो पैंतरा बदलकर संप्रग के घटक दलों लालू प्रसाद यादव की राजद और रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति के साथ गठबंधन करके केन्द्र की राजनीति में एक नए शक्ति केन्द्र के रूप में उभरने की चाल चली।

लगातार पैंतरे बदल रहे सपा मुखिया यादव का एक और दाव उलटा पड़ गया, जब उन्होंने एक जमाने के उनके धुर विरोधी और कभी राम मंदिर आंदोलन के नायक रहे कल्याण सिंह से दोस्ती कर ली। इसे लेकर पार्टी के एक तबके में विरोध के स्वर उभरे और पार्टी का मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले आजम खां ने तो विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। सपा मुखिया ने सियासत की बिसात पर जितनी भी चालें चलीं सब उलटी पड़ गईं और लोकसभा चुनाव के परिणाम उन्हें सपनों की मखमली दुनिया से हकीकत की सख्त चट्टान पर पटक गए। सपा का वोट प्रतिशत 25 से 23 पर उतर आया और सीटें मिली सिर्फ 23, जो कि पिछले लोकसभा चुनाव में जीतीं 35 सीटों के मुकाबले 12 कम थी।

पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी के अनुसार वर्ष 2009 प्रदेश में लोकतंत्र की हत्या का वर्ष रहा और उनकी पार्टी प्रदेश में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष कर रही है। सपा और बसपा के बिखरे सपनों पर कांग्रेस ने अपनी उम्मीदों का महल बनाया। कांग्रेस का मत प्रतिशत 18 से उपर निकल गया यानी विधानसभा चुनाव के मुकाबले दो गुने से भी आगे। पार्टी को अप्रत्याशित रूप से 21 और उपचुनाव में जीती फिरोजाबाद समेत कुल 22 सीटों पर जीत मिली और इसी के साथ पार्टी ने प्रदेश की राजनीति में जोरदार वापसी की आहट दी। कांग्रेस को जो लाभ हुआ सो तो हुआ ही, सबसे ज्यादा फायदा पार्टी के युवराज कहे जाने वाले राहुल गांधी को हुआ। राजनीतिक प्रेक्षकों ने इसे कांग्रेस के बच्चे राहुल गांधी को राजनीति के मैदान में जवान और परिपक्व होना करार दिया।

विधानसभा चुनाव से लोकसभा चुनाव के बीच के ढ़ाई वर्ष में भाजपा का मतप्रतिशत लगभग 17 से बढ़कर 17.5 प्रतिशत हो गया, मगर वह पिछले लोकसभा चुनाव में जीती 10 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई। बीते वर्ष प्रदेश की राजनीति में आए बदलाव को और करीब से देखना चाहें तो लोकसभा चुनाव में विभिन्न पार्टियों को मिली सफलता को विधानसभा सीटों के आइने में देख लें। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अगर लोकसभा चुनाव में मिले वोट विधानसभाओं में बांट दे तो प्रदेश की 403 सीटों में से सपा 118, बसपा पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले लगभग आधे यानी 100, कांग्रेस पिछले विधानसभा में मिली 22 के मुकाबले 95 और भाजपा पिछले विधानसभा चुनाव में जीती 51 के मुकाबले 62 सीटों पर विजयी दिखाई पड़ी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जनाधार रखने वाली राष्ट्रीय लोकदल लोकसभा चुनाव में जीती पांच सीटों के आधार पर विधानसभा की 21 सीटों पर विजयी भूमिका में रही। लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा की 15 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में बसपा ने 12 सीटों पर कब्जा करके फिर से प्रदेश की राजनीति में अपने आधिपत्य का संकेत तो दिया, मगर राजनीतिक प्रेक्षकों ने इसे उपचुनाव ही तो है कहकर अनदेखा कर दिया।

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