class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बड़ों की जेल में मासूम बचपन

तेरह बरस का रियाज़ (बदला हुआ नाम) इन दिनों श्रीनगर की जेल में बन्द है। कुछ महीने पहले अपने नगर में किसी युवक की सुरक्षाबलों द्वारा की गयी हत्या के बाद जो उग्र प्रदर्शन हुए थे उसमें स्कूल से लौट रहा रियाज़ भी फंस गया था। पुलिस पर पथराव करने के आरोप में स्कूली बस्ते के साथ ही पुलिसवालों ने उसे पकड़ लिया था और नगर की जेल में पहले से जमा भीड़ के चलते श्रीनगर जेल भेजा गया था। इन दिनों वह जेल में अन्य वयस्क कैदियों के साथ ही रहता है।

जिनमें ऐसे बन्दियों की भी अच्छी-खासी तादाद हैं जो अतिवादी हैं। फैक्टरी में मजदूर के तौर पर काम करनेवाले उसके पिता, जो कुपवाड़ा में रहते हैं, कभी कभी उससे मिलने आते हैं। मां पहले ही गुजर गयी है और उसके तीन छोटे भाई-बहन भी है। फिलवक्त यह कहना मुश्किल है कि रियाज़ की रिहाई कब होगी? उसके पिता इतने सम्पन्न भी नहीं हैं कि वह कोई अच्छा वकील कर सकें। ‘पब्लिक सेफ्टी एक्ट’ नाम के जिस कानून के तहत गिरफ्तार हुआ है, उसमें अपने अपराध के लिए जमानत कराने में ही कई बार सात-आठ महीने गुजर जाते हैं।

कश्मीर की जेल में बन्द बच्चों और किशोरों में रियाज अकेला नहीं है। उसके जैसे तमाम बच्चे हैं जो अलग अलग जेलों में बन्द हैं। खबरों के अनुसार पिछले साल दो महीने के अन्दर इस विवादास्पद कानून के तहत लगभग 160 बच्चों को पकड़ा गया था। दरअसल वर्ष 1990 से ही जबसे कश्मीर में मिलिटेन्सी ने जोर पकड़ा है, पुलिस की तरफ से इसी कानून के अन्तर्गत बच्चों को पकड़ा जा रहा है।

आखिर ऐसी क्या बात आन पड़ी कि बच्चों को भी जेलो में ठूंसना पड़ रहा है। दरअसल कश्मीर में बाल सुधार गृह हैं ही नहीं। वैसे कश्मीर की सरकार ने वर्ष 1997 में ही अपने बाल अपराध अधिनियम को पारित किया है ताकि बाल अदालतों के निर्माण को सुगम बनाया जा सके। विडम्बना यही है कि अदालतें इस कानून का सहारा नहीं लेती और सबसे चिंतित करनेवाली बात यह है कि राज्य में बाल अदालत भी नहीं हैं।

पिछले दिनों एक मानवाधिकार कार्यकर्ता वकील ने अदालत में इस अधिनियम के अमल के लिए अदालत मे जनहितयाचिका दायर की है, इस सिलसिले में राज्य को नोटिस भी जारी हो चुका है। इसे सियासी उठापटक का नतीजा कहें या शेष समाज की मानसिकता कि आज की तारीख में भी कश्मीर में बाल सुधार गृह की गैरमौजूदगी का सवाल कभी एजेंडा पर नहीं आ सका है।

भारत बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के कन्वेन्शन पर दस्तखत करने वाले देशों में अग्रणी रहा है, लेकिन उनका यह संकल्प भी गोया जम्मू कश्मीर की सीमा पर जाकर ठहर जाते हैं। कश्मीर को संविधान में विशेष दर्जा दिया गया है, फिर यह मसला कश्मीर की पार्टियों और जमातों के जिम्मे अधिक आता है, जिन्होंने इस पर मौन रहना ही बेहतर समझा है। वे दावा कर सकते हैं कि उनके सामने बड़े बड़े मुद्दे हैं, उसके सामने बाल सुधार गृह के न होने का मुद्दा कहीं नहीं ठहरता है।

ऐसी बात नहीं हैं कि शेष हिन्दोस्तां में बन बाल सुधार गृह कोई ‘स्वर्ग’ हैं जहां पहुंचे गुमराह बच्चे या किन्हीं अपराध में संलिप्त पाए गए बच्चे सुकून से रहते हैं, या जहां उनके समूचे अधिकारों की गारण्टी होती है। दरअसल, आए दिन ऐसे बाल सुधार गृहों की ख़बर आती रहती है जो इसी बात को उजागर करती है वह प्रशासनिक बेरूखी और निर्लिप्तता तथा बड़े बच्चों के हाथों छोटों को झेलनी पड़ती तरह तरह की प्रताडनाओं, हिंसा के घरों में रूपान्तरित हो चुके हैं।

पिछले दिनों दिल्ली के बाल सुधार गृह की भारी दुर्दशा को लेकर वहां के बंद बच्चों के भागने की भी ख़बर आयी थी। लेकिन कम से कम इतना सुकून तो रहता ही है कि वे वयस्कों के साथ रहने के लिए अभिशप्त न हों और इस बात की भी सम्भावना रहती है कि अगर कमियों को ठीक किया जाए या कभी कोई सरोकार रखने वाले वरिष्ठ अधिकारी देखरेख करें तो बच्चे सुधर भी सकते हैं तथा ‘सुधार गृह’ के बाद का सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार निकल सकते हैं। और सबसे बढ़ कर ऐसे बाल सुधार गृह और बाल अदालतों की मौजूदगी संयुक्त राष्ट्रसंघ के बाल अधिकारों के कन्वेन्शन के अनुरूप मानी जा सकती है, जिसमें बच्चों को वयस्कों के साथ बन्दीगृहों में रखने पर सख्त एतराज जताया गया है।

अगर हम बाल अधिकार को लेकर संयुक्त राष्ट्रसंघ के कन्वेन्शन के दिशानिर्देशों के अन्तर्गत वर्ष 2000 में बने ‘जुवेनाइल जस्टिस (केअर एंड प्रोटेक्शन) अधिनियम को देखें तो पता चलता है कि इसके अन्तर्गत बच्चों को दो श्रेणी में बांटा गया है। एक तो ऐसे बच्चे जिन्होंने कोई ‘अपराध’ किया है तथा दूसरे ऐसे बच्चे जो अनाथ हैं, भागे हुए हैं या भिखारी रहे हैं जिनको ऐसे बच्चों की श्रेणी में शुमार किया जाता है जिन्हें ‘देखरेख और सुरक्षा की’ आवश्यकता है। मसलन महाराष्ट्र के बारे में किए गए अध्ययन बताते हैं कि वहां इस अधिनियम के तहत बने 46 आबजर्वेशन होम्स हैं जो कम से कम दोनों श्रेणियों के नौ से 10 हजार बच्चों की देखरेख करते है। इन ‘आवासों’ को राज्य के महिला व बाल कल्याण विभाग द्वारा स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से स्वतंत्र रूप से संचालित किया जाता है।

कहने के लिए कश्मीर के कानून में लिखा गया है कि अवयस्कों की गिरफ्तारी सुधारात्मक होगी न कि दण्डात्मक, लेकिन हकीकत इसके विपरीत दिखती है। अक्तूबर माह में पथराव करने के आरोप में पकड़े गए 11 किशोरों में से तीन ने पुलिस पर आरोप लगाया कि उसने उन्हें एक दूसरे के साथ जबरन यौन सम्बन्ध बनाने के लिए मजबूर किया। ‘कश्मीर लाईफ’ के सम्वाददाता माजिद मकबूल से बात करते हुए उनमें से एक 14 साल के सहीम ने बताया कि पुलिस ने उन्हें काफी पीटा, निर्वस्त्र किया और जबरन यौन उत्पीड़न भी किया। कश्मीर ही नहीं ऐसी घटनाएं कहीं भी हो सकती हैं, लेकिन क्या कश्मीर में बाल सुधार गृह का न होना क्या राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए? बाल अधिकारों के प्रति मानवता द्वारा जाहिर की गयी प्रतिबद्घता का माखौल उड़ाती यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के गाल पर तमाचा समझे जानी चाहिए।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

subhash_gatade@rediffmail.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बड़ों की जेल में मासूम बचपन