class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चूल्हे से वार्मिग

जलवायु परिवर्तन पर अमीर और गरीब देशों की राजनीति इतनी हावी हो गई है कि पूरी सतर्कता के साथ किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों पर भी उसकी छाया का आभास होता है। इसी तरह की एक छाया अमेरिकी संस्था नेशनल एअरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी नासा के उस अध्ययन में भी दिखाई पड़ती है जिसमें दावा किया गया है कि स्थानीय प्रदूषण अंतरराष्ट्रीय कार्बन उत्सर्जन के मुकाबले पांच गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। अध्ययन के अनुसार शहर की गाड़ियों और गांव के चूल्हों से निकलने वाले धुएं से हिमालय का ग्लेशियर पिघल रहा है।

तर्क यह है कि भारत और नेपाल में जलने वाला जैव ईंधन काला कार्बन पैदा करता है, जिसकी परत सूरज की किरणों को सोख कर हिमालय को गर्म कर देती है। यही गर्मी ग्लेशियर को पिघला रही है और पिछले साठ सालों में अगर ग्लेशियर का 20 फीसदी हिस्सा पिघला है तो उसके 17 फीसदी हिस्से के लिए यही घरेलू प्रदूषण जिम्मेदार है।

इस अध्ययन का लब्बोलुआब यही है कि पिछड़े और विकासशील देश दुनिया के औद्योगिक देशों पर ग्लोबल वार्मिग का आरोप लगाने से पहले अपना चूल्हा बदलें और अपने शहर की गाड़ियों के लिए ज्यादा साफ सुथरे ईंधन का इंतजाम करें। इस मकसद के लिए प्रौद्योगिकी तैयार करना और बेचना अमीर देशों के लिए कम खर्चीला और आसान भी पड़ेगा। इसका मतलब यह नहीं है कि इस अध्ययन के वैज्ञानिक आधार को खारिज कर दिया जाए। वह आधार अपनी जगह पर सही हो सकता है। लेकिन इस पर जरूरत से ज्यादा जोर देने के जो राजनीतिक पूर्वाग्रह हैं उससे बचना जरूरी है। इसका यह अर्थ भी निकलता है कि गरीब आदमी जिसकी मजबूरी चूल्हा जलाना है वह धरती के जलवायु को ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। जबकि ऐसा है नहीं।

प्रौद्योगिकी के अभाव में गरीब आदमी धरती की उस ऊर्जा का अधिक इस्तेमाल करता है जो नवीकृत होती रहती है। वह समाज के संपन्न वर्ग के विपरीत जीवाश्म वाली ऊर्जा का प्रयोग कम से कम करता है। वह पिछड़ा होने के बावजूद ऊर्जा प्रयोग के मामले में ऐसी अग्रिम अवस्था में है जो समाज के लिए अनुकरणीय हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि सब लोग चूल्हा जलाने लगें और गांवों के पुराने ढंग के चूल्हों को ही चलने दिया जाए। जरूरत गांवों के पुराने ढंग के चूल्हों को बदलने की भी है और हमें सौर, वायु या दूसरे किस्म के उन ऊर्जा स्त्रोतों को बढ़ाने की है जिनका लगातार नवीकरण होता रहता है। साथ ही शहरों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए भी गाड़ियों की संख्या और उसके ईंधन की गुणवत्ता पर निगरानी की जरूरत है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:चूल्हे से वार्मिग