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दो टूक (29 दिसंबर, 2009)

रुचिका मामले ने, देर से ही सही, इस बात की जरूरत का अहसास कराया कि थाने में आने वाली हर शिकायत को एफआईआर समझा जाए। कमजोर तबकों के हजारों प्रताड़ित थानों से रोजाना निराश लौटते हैं। ताकतवर गुनहगारों के दबाव में पुलिस उनकी गुहार नहीं सुनती और अपराधियों के हौसले बुलंद रहते हैं।

पहली ही शिकायत को एफआईआर मानने की व्यवस्था से पुलिस की मनमर्जी पर थोड़ा-बहुत अंकुश जरूर लगेगा। हालांकि सही मायने में पुलिस तंत्र को ईमानदार और संवेदनशील बनाए बगैर उसके कायाकल्प की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इस मंजिल की राह में भ्रष्ट राजनीति सबसे बड़ा रोड़ा है। राजनीतिक व्यवस्था ईमानदार हो और अपने कहे पर चले तो छोटी-छोटी बातों के लिए कानूनी नुस्खों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

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