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समाधि की पात्रता

समाधि का अर्थ है समाधान। जिस प्रवृत्ति या निवृत्ति के माध्यम से व्यक्ति अपने मन, वाणी और कर्म को समाहित कर सके, वह समाधि होती है। व्यापक दृष्टि से समाधि की परिभाषा है- ज्ञान, दर्शन और चरित्र की समन्विति। जहां ज्ञान, दर्शन और चरित्र समग्रता से उपलब्ध हो जाते हैं, वहां समाधि भी अपने चरम प्रकर्ष के साथ अभिव्यक्त होती है। इनकी समग्रता में जितनी कमी रहती है, समाधि की परिपूर्णता में भी उतनी ही कमी रह जाती है। 

समाधि कौन प्राप्त कर सकता है? इस प्रश्न को उत्तरित करते हुए भगवान महावीर ने कहा-‘समाही अपडिन्ने’ समाधि अप्रतिज्ञा में है। प्रतिज्ञा संकल्प-विकल्पों का उत्स है। व्यक्ति किसी भी वस्तु को उपलब्ध करने के लिए संकल्पबद्घ होता है तो नये-नये विकल्प उसके मस्तिष्क में नयी-नयी धारणाओं को जन्म देते रहेंगे। व्यक्ति कोई भी काम करता है और उसके फल के प्रति संदिग्धि रहता है- वह उस काम में सफल नहीं हो सकता।

संदिग्ध व्यक्ति न तो कोई उपलब्धि कर सकता है और न ही वह समाधिस्थ बन सकता है। इसीलिए समाधि की खोज में लगे हुये व्यक्ति को निर्विचिकित्स रहने का अभ्यास होना चाहिए। समाधि के अनेक प्रकारों में एक प्रकार है ‘विनय-समाधि।’ विनय का अर्थ है अपनयन। व्यवहार के धरातल पर नम्रता, शिष्टाचार या बड़ों के प्रति पूज्यभाव की अभिव्यक्ति को विनय कहा जाता है, किंतु शब्द शास्त्रीय दृष्टिकोण इसे भिन्न रूप से परिभाषित करता है। विनीयन्ते अपनीयन्ते कर्माणि येन असौ विनय-जिस प्रक्रिया से कर्मों का अपनयन हो वह विनय है।

चेतना के स्तर पर अस्मिता को तोड़ना और शरीर के स्तर पर श्वास का रेचन करना विनय समाधि है। ये दोनों क्रियाएं परस्पर सापेक्ष हैं। शारीरिक स्तर पर जब श्वास दीर्घ और सूक्ष्म हो जायेगा, कषाय के प्रतंतु अपने आप श्लथ होने लगेंगे। इस समाधि में सबसे बड़ी बाधा है। इसके चार बिन्दु है-क्रोध, मान, माया और लोभ। ये चारों ही आत्मघाती है अत: समाधि का पथ प्रशस्त नहीं होने देते।

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