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इसे हंगामे का मन्दिर न बनाएं

हम अपने सांसदों से यह उम्मीद करते है कि वे हमारी समस्याओं को सदन में उठाएँगे मगर ऐसा होता नही है। वे इस बात को भी अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें इस समय पूरा हिंदुस्तान देख रहा है मगर वे अपनी इस आदत से पीछा ही छुड़ाना नही चाहते। अब संसद को सिर्फ एक सब्जी मंडी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर 26000 रुपए खर्च होते हैं। सांसदों को देश कि जनता कि कमाई का दुरुपयोग करने का कोई अधिकार नही है।
अंकित सिंघल, पी-1/53 मगोलपुरी, नई दिल्ली

तरीका बदलें
दवा बनाने वाली कंपनियां अपनी दवाइयों को सिल्वर फॉइल में लपेटती हैं और उस पर कीमत वह दवा की मियाद वगैर छपी होती है। मगर यह फॉइल इतना चमकदार होता है कि उसे पढ़ना अक्सर बहुत मुशकिल हो जाता है। सरकार को ऐसा सख्त नियम बना देना चाहिए जिससे चमकदार रैपर में दवा न बेची जा सके। दवा फैशन की चीज नहीं है कि उसे चमकदार ढंग से बेचा जाए।
तरुण कुमार जैन, रामा ब्लॉक, दिल्ली- 32

जागने की घड़ी
दुनिया में हर इंसान को अब जाग जाना चाहिए वर्ना ग्लोबल वार्मिग हमे कहीं का नहीं छोड़ेगी। जरूरत यह है कि अब कर कोई अपने स्तर पर कार्बन डाइआक्साइड को कम करने के प्रयास करे, चाहे हरे पेड़ पौधे लगाकर या किसी और तरह से। सभी को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि हमारा हर कदम धरती को बचाने के लिए होगा।
नदीश खान, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली - 17

आज की राजनीति
आज की राजनीति में सच्चरित्रता, ईमानदारी, नैतिकता, सदाचार का कोई मूल्य नहीं। एक दिन में तीन बार, चार बार दल बदलने के मामले सामने आ रहे हैं। रातों-रात ऐसे समीकरण बनते हैं कि दिमाग चकरा जाता है। सत्ता और संगठन में जगह नहीं मिल पाती तो उस दल के विधायक और सांसद पहले अपनी असंतुष्ट गतिविधियां चलाते हैं, दूसरे दलों से दुरभिसंधि करते हैं और अपनी एक अलग पार्टी बना लेते हैं।      
विष्णु रोजसरा, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद

खंडित जनादेश क्यों?
यह विचारणीय प्रश्न है कि खंडित जनादेश क्यों मिलता है। हमारे देश की राजनीति में बिखराव आया है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, शिक्षा, बिजली-पानी जैसे मुद्दों पर चुनाव न लड़ा जाना ही बिखराव का कारण है। राजनीति के खंडित हो जाने से जनादेश भी खंडित ही मिलता है। विसंगतियां भी खंडित जनादेश का कारण हैं।
रमेश जोशी, ऋषिकेश

रुचिका के बहाने
रुचिका के मामले ने न केवल महिला शोषण, बल्कि पुलिस प्रशासन के अत्याचार, न्यायप्रणाली की सुस्ती तथा राजनीतिक लीपापोती की पोल खोल दी है। ऊँची पहुँच वाले राठौर ने न केवल छेड़खानी की, बल्कि नाबालिग को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया।
प्रज्ञा पाण्डेय, हरिद्वार

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