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सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए जारी रहे भारतीय प्रयास

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग के भारत के प्रयासों को वर्ष 2009 में कुछ सफलता मिली और विश्व निकाय ने इस मुद्दे पर एक अंतर सरकारी वार्ता का खाका स्वीकार कर लिया। भारत की आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक संधि की मांग की दिशा में भी प्रगति हुई।

भारतीय मिशन के मुताबिक उसके एजेंडे की शीर्ष प्राथमिकताओं की दिशा में प्रगति हुई है। मिशन के अनुसार वह अगले साल अक्टूबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होने जा रहे चुनावों में अस्थायी सीट के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के उपदूत मंजीव सिंह पुरी ने बताया कि सुरक्षा परिषद में सुधार का सवाल हमारे लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। यह एक महत्वपूर्ण वर्ष है। सुधार की दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ा है। उन्होंने बताया कि इस साल सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर अंतर सरकारी बातचीत शुरू हुई और महासभा के पिछले सत्र में इस बातचीत में अच्छी प्रगति भी हुई। उन्होंने संकेत दिया कि आगे की बातचीत प्रगति पर ही आधारित होगी।

सुरक्षा परिषद में सुधार के मुद्दे पर पिछले 15 साल से अधिक समय में हुई बातचीत की प्रगति आंशिक थी। बहरहाल नए सदस्यों की संख्या और उन्हें वीटो का अधिकार देने संबंधी मूल मुद्दों पर लगातार बैठकें होने के बाद भी कोई फैसला नहीं हो पाया।

कुछ पर्यवेक्षकों की राय है कि भारत कुछ समय तक इंतजार कर सकता है क्योंकि आगामी वर्षों में सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का उसका दावा विभिन्न क्षेत्रों में उसके संसाधनों में वृद्धि के साथ-साथ मजबूत होगा। लेकिन पुरी मानते हैं कि प्रक्रिया को टाला नहीं जा सकता।

आतंकवाद के खिलाफ कानूनी लड़ाई की जरूरत पर भारत के प्रयासों को भी इस साल सफलता मिली। 1996 में नई दिल्ली ने आतंकवाद पर एक वैश्विक संधि के प्रस्ताव का प्रारूप पेश किया था। लेकिन तब आतंकवाद की परिभाषा, मुक्ति आंदोलनों और सशस्त्र बलों की स्थिति को लेकर बातचीत ठहर गई थी।
   
पुरी कहते हैं इस साल अच्छी बात यह रही कि हमने महत्वपूर्ण तरीके से तथ्यों को पेश किया और जटिल राजनीतिक मुद्दे को छोड़ कर शेष ढांचे पर सहमति बन गई। यह एक संधि है जो कानून लागू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बारे में है। वर्तमान में इस दिशा में हो रहे सहयोग को पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

अंतरराष्ट्रीय शांतिबहाली अभियानों के बारे में कूटनीतिज्ञों का कहना है कि भारत को अब केवल सैनिकों का योगदान देने वाले देश ट्रूप कंट्रीब्यूटर कंट्री (टीसीसी) के बजाय एक साझीदार के रूप में जाना जाता है। पुरी कहते हैं कि आज उग्रवाद से निपटने, राष्ट्र निर्माण से लेकर कई क्षेत्रों के बारे में शांति बहाली की जरूरत है। बदलते परिदृश्य में भारत की भूमिका भी बदल गई है। वह टीसीसी के बजाये साझीदार बन गया है।

मानवाधिकार के मोर्चे पर पर्यवेक्षकों की राय है कि घरेलू स्तर पर मानवाधिकार के संदर्भ में भारत और उदार तथा अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर संतुलित हुआ है। इस साल भारत ने मानवाधिकार और मानवीय कानून से जुड़े कुछ मुद्दों पर कड़ी आवाज उठाई, जिससे उसकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी का पता चलता है। भारत महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव का सह प्रायोजक भी रहा।

पुरी ने बताया कि अगले साल भारत का ध्यान अक्टूबर में होने जा रहे सुरक्षा परिषद के चुनावों में अस्थायी सदस्यता के लिए निर्वाचन पर होगा। 2009 में संयुक्त राष्ट्र का ध्यान जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर केंद्रित रहा, लेकिन साल के अंत में डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन में इस बारे में कोई सहमति नहीं बन पाई कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए।   

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जो भी भाषण दिया, उसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कोपनहेगन सम्मेलन के रूप में मिल रहे मौके को न गंवाने का आह्वान किया। लेकिन उनके प्रयास नाकाम रहे।
   
कोपनहेगन सम्मेलन से पहले सितंबर में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में जलवायु परिवर्तन पर एक उच्च स्तरीय सम्मेलन के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ को बुलाने का विचार बान की मून का ही था।

जलवायु परिवर्तन से निपटने पर जोर देने के लिए निकाली गई रैली में ब्राजील की सुपर मॉडल गिसेल बुंडचेन ने भाग लिया वहीं भारत से लखनऊ की 13 वर्षीय युगरत्ना श्रीवास्तव ने महासभा में ओबामा, जिन्ताओ सहित 100 वैश्विक नेताओं का ध्यान जलवायु परिवर्तन की समस्या की ओर आकृष्ट करने में सफल होते हुए उनसे कार्रवाई करने का अनुरोध किया।
   
महासभा की बैठक में भारत ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का अपना दावा फिर दोहराया। परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और व्यापक परमाणु परीक्षण निरोध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर करने के लिए पड़ रहे दबाव से भारत बेअसर रहा। इस बीच अमेरिका और रूस एक नए समझौते पर सहमत हो गए जिसके अनुसार वे अपने परमाणु हथियारों में एक तिहाई कटौती करेंगे।

वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मानवीय तथा राहत कार्यों में लगे अपने कई कर्मचारी खोए और नई तैनाती उसे करनी पड़ी। बाद में विश्व संस्था के महासचिव ने कहा कि नई तैनाती को वापसी नहीं समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि हम जा नहीं रहे हैं। न हम जाएंगे, न हम जा सकते हैं और न ही हमें जाना चाहिए। हमारा काम जारी रहेगा।

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