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अपने अंदर के हस्तिनापुर को मारना होगा

जिन्हें टेलीविजन पर नाज नहीं है वो आज कहां है। ये सवाल मेरे दिल में पिछले एक हफ्ते से घूम रहा है। मन उन टिप्पणीकारों को खोज रहा है जो अकसर टीवी को अपने कॉलम में कोसते रहते हैं। टीवी ने चंडीगढ़ की रुचिका का केस उठाया और उसे उस मुकाम तक पहुंचाया जिस तक लाने के लिये रुचिका और उनकी दोस्त के परिवार को 19 साल लग गये फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिला। टीवी ने ये कहानी जोरदार तरीके से दिखायी कि कैसे एक मासूम अन्याय का शिकार होती है और जब वे उसका प्रतिकार करती है तो उसे खुदकुशी के लिये मजबूर होना पड़ता है। उसके भाई को पुलिस के अंदाज में ही एक झूठे केस में फंसाया जाता है। उसके साथ जानवरों की तरह बर्ताव होता है। उसके पिता की नौकरी छीन ली जाती है। उन्हें मजबूरन अपना मकान बेचना पड़ता है। और 19 साल तक तिल-तिल कर मरना पड़ता है, क्योंकि उनके सामने खड़ा था एक ऐसा शख्स जो हमारे सिस्टम से बड़ा था, जो था तो पुलिस अफसर लेकिन उससे पुलिस भी डरती थी, उससे डरते थे उसके अपने महकमे के सीनियर अफसर।

ये टीवी ने दिखाया कि कैसे एक आईजी के खिलाफ उसका डीजीपी जांच करता है, जांच में उसे दोषी पाता है, लेकिन वो डीजीपी इतना निरीह है कि बजाय कार्रवाई करने के फाइल गृहसचिव के पास भेज देता है। गृहसचिव महोदय की रीढ़ की हड्डी इतनी मजबूत थी कि वो फाइल सरका देते हैं राज्य के गृहमंत्री की मेज पर। और गृहमंत्री का ईमान इतना तगड़ा था कि वो एक चौदह साल की लड़की के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना पर कार्रवाई के लिये राज्य के मुख्यमंत्री का मुंह देखते हैं। और मुंख्यमंत्री क्या करें वे तो अपनी पार्टी के मुखिया का गुलाम है। लिहाजा आईजी राठौर दबंगई के साथ घूमता है। वह नौ साल तक इस मामले की एफआईआर तक दर्ज नहीं होने देता।

ये टीवी ने बताया कि एफआईआर दर्ज कराने के लिये सुप्रीम कोर्ट को दखल देनी पड़ती है। इस सब में लग जाते हैं पूरे नौ साल। हर कदम पर आई इन तमाम बाधाओं से गुजर कर ये केस खरामा-खरामा चलता है अगले दस साल तक। और इस अपराध के लिये अदालत सजा सुनाती है सिर्फ छह महीने। सजा के बाद राठौर की हिम्मत देखिये वो टीवी के सामने मुस्कुराता है और फोन पर फिर परिवार को मिलती है धमकी क्या कर लिया तुमने यानी सिस्टम की ऐसी की तैसी और जब सिस्टम पूरी तरह से एक कोने में पड़ा कराह रहा होता है तब टीवी इस मामले को उठाता है। और इसके बाद आगाज होता है एक आंदोलन की शुरुआत का। अचानक एक जनजागरण सा होता है और राठौर के खिलाफ चढ़ने लगता है गुस्सा। फिर कोने में फटेहाल पड़े सिस्टम को शर्म आती है, वो मानता है अपनी गलती और कहता है कि जो कुछ भी हुआ वो गलत हुआ, अब वो राठौर को देगा सजा।

ये कहानी जब पहली बार हम टीवी वालों के सामने आयी तो सहसा यकीन ही नहीं हुआ। कहानी तो मैंने सिर्फ फिल्मों में ही देखी थी। लेकिन इस मामले की हकीकत मुंबई में बनी फिल्मों से कहीं ज्यादा कड़वी थी और भयानक भी। सबसे पहले जब यह खबर सामने आई तो हमने सबसे पहले यही सोचा कि रुचिका की ये कहानी पुलिस और राजनेता के गठजोड़ को एक्सपोज करती है क्योंकि कोई भी पुलिस अफसर बिना किसी राजनेता की शह के इतना ताकतवर हो ही नहीं सकता है। तत्काल ही यह भी बात दिमाग में आई कि हमारा पूरा का पूरा प्रशासनिक और न्यायिक ढांचा चरमरा गया है, अन्यथा ये कैसे संभव है कि 19 साल तक किसी को न्याय न मिले और मिले भी तो सिर्फ रस्मअदायगी की तरह। वे भी ऐसा कि सजा पाने वाला विजय की मुद्रा में अदालत से निकले। और सच के लिए खड़े होने वालों को लगे कि वे हार गए।

ये भी सोचा कि कि ये कैसा लोकतंत्र है कि हरियाणा के लोगों को 19 साल तक इस सवाल ने कभी नहीं झकझोरा? ये लगा कि ये केस सिर्फ एक परिवार की अदम्य इच्छा शक्ति का भी नहीं है जो अपनी बेटी की दोस्त को इंसाफ दिलाने के लिये 19 साल तक लड़ता है। तब समझ में आया कि ये कहानी तो दरअसल हमारी मरी हुई आत्मा की कहानी है, जिसकी संवेदनाएं मर चुकी है जिसमें कहीं कोई स्पंदन नहीं है। ये आत्मा सिर्फ हमारी और आपकी आत्मा नहीं है। ये आत्मा है हमारी, आपकी और सब भारतीयों की।

ये सिर्फ इसी देश में संभव है कि 1984 सिख दंगों में 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिलता। ये सिर्फ इसी देश में हो सकता है कि गुजरात दंगों के अपराधी दनदनाते घूमें और उसको सरेआम सही ठहराया जाये। ये सिर्फ
इसी देश में होता है कि भोपाल गैस त्रसदी में किसी को भी सजा नहीं मिलती है और किसी की सेहत पर असर नहीं होता। ये हिंदुस्तान में ही हो सकता है कि बाबरी मस्जिद गिर जाती है और जस्टिस लिब्रहान को लग जाते हैं 17 साल और 48 एक्सटेंशन और सरकार किसी के खिलाफ कार्रवाई नही करती है। बोफोर्स में घूस खाने वाले को हम पकड़ नहीं पाते हैं।

ये हम भारतीयों के बीच ही संभव है कि आये दिन गड्ढों में मासूम बच्चे गिरते हैं और मर जाते हैं और किसी के कानों पर जू तक नहीं रेंगती? और फिर टीवी पर आरोप लगाया जाता है कि आप प्रिंस को इतना क्यों दिखाते हैं। एक समाज जो दोषियों, यहां तक कि हत्यारों को भी सजा नहीं दे पाता, लेकिन वहां टेलीविजन और मीडिया को अक्सर कटघरे में खड़ा किया जाता है।

लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं
ashutosh@network18online.com

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