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महंगाई बढ़ती रही, भूख पर बहस चलती रही

भारत ने वर्ष 2009 के दौरान ज्यादातर समय या तो नकारात्मक या लगभग शून्य के स्तर के आसपास की महंगाई की दर को देखा। लेकिन मुद्रास्फीति के आंकड़ों की बात अलग है, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में इस साल इतनी अधिक बढ़ोतरी हुई कि इसे आम आदमी के लिए एक दशक से अधिक का सबसे खराब साल माना जा सकता है। प्याज, आलू और दलहनों की जेब छलनी करने वाली आसमान छूती कीमतों ने आम आदमी को वर्ष 2009 में डराये रखा।

मुद्रास्फीति मूल्यवद्धि की सही तस्वीर को पेश करे, इसके लिए सरकार ने मुद्रास्फीति के दो तरह के आंकड़े निकालने का फैसला किया है। पहली तरह का आंकड़ा साप्ताहिक आधार पर खाद्य पदार्थों की कीमतों के बारे में होगा। इससे साप्ताहिक आधार पर यह आकलन लगाया जा सकेगा कि खाद्य सामग्रियों, फलों और सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी का आम आदमी पर क्या असर पड़ रहा है।

जबकि दूसरा आंकड़ा विनिर्मित उत्पादों को साथ लेकर मुद्रास्फीति के संदर्भ में व्यापक आंकड़ों का होगा जो मासिक आधार पर जारी किया जाएगा।
    
हालांकि थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर एक अगस्त को नकारात्मक 1. 74 प्रतिशत पर थी। लेकिन सरकार द्वारा अक्टूबर में अपनाई गई नई प्रणाली से पता चलता है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। यह पिछले एक दशक की सबसे बड़ी वृद्धि है।

सरकार की ओर से किए गए प्रशासनिक उपाय खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हुए। चिंतित होकर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतें हमारे लिए सबसे चिंता का विषय है। सोनिया गांधी ने कहा था कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इस मसले पर प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री से बात की है और उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार इस मसले को सुलझाने के लिए हरसंभव कदम उठाएगी।
  
वहीं दूसरी ओर भारतीय रिजर्व बैंक का द्वंद्व है कि ऐसे समय जब अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से उबर रही है, तो क्या कड़े मौद्रिक उपाय लागू करना उचित होगा।

ताजा आंकड़े दर्शाते हैं कि नवंबर के चौथे सप्ताह में खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति बढ़कर 19.05 प्रतिशत हो गई, जिसका मुख्य कारण आलू, प्याज और दलहनों की कीमतों में आई भारी तेजी है। ये तीनों खाद्य वस्तुएं लोगों के दैनिक उपभोग में आने वाली वस्तुएं हैं।

वर्ष के दौरान जहां आलू की कीमतें दोगुनी बढ़ीं वहीं दलहन की कीमतें 42 प्रतिशत महंगी हुई और प्याज 23.4 प्रतिशत महंगा हुआ। विनिर्मित सामग्रियों में चीनी ने सबसे ज्यादा मुद्रास्फीति को बढ़ाने में योगदान किया।

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा था कि जहां खाद्य कीमतों पर अंकुश लगाने के लिहाज से मौद्रिक नीतियां निष्प्रभावी उपाय हैं वहीं यह हथियार मुद्रास्फीतिकारी अपेक्षाओं को दूर करने के लिहाज से जरूरी हैं।
 
भारतीय रिजर्व बैंक अपने मौजूदा नरम मौद्रिक नीति के रूख की 29 जनवरी को समीक्षा करेगा। हालांकि सुब्बाराव ने कहा है कि उपभोक्ता कीमतों के मुकाबले थोक मूल्य सूचकांक काफी कम है।

मुद्रास्फीति के मासिक आधार पर आंकड़े जारी करने के अलावा सरकार ने मुद्रास्फीति के लिए आधारवर्ष को 1993-94 के बजाय 2004-05 करने का भी फैसला किया।

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