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कृषि पर साल भर पड़ती रही प्रकृति की मार

भारत के कृषि क्षेत्र को 2009 में सूखे के साथ बाढ़ की मार भी झेलनी पड़ी। इसका नतीजा यह हुआ कि सब्जियों के साथ-साथ दालों, चीनी और अनाज के दाम आसमान पर पहुंच गए, जिसका खामियाजा उपभोक्तओं को भुगतना पड़ा। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार मई में फिर सत्ता पर काबिज हुई, लेकिन कृषि उत्पादों की ऊंची कीमतों से उसका जोश ठंडा पड़ गया।

पिछले दो साल के दौरान कृषि क्षेत्र खाद्यान्न उत्पादन के मामले में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था। लेकिन इस साल खाद्यान्न उत्पादन तो पिछले साल के स्तर पर भी कायम रहने में असफल रहा है। देश का आधा हिस्सा सूखे से प्रभावित रहा। यह 1972 के बाद सूखे की सबसे खराब स्थिति है। हालांकि 1979, 1987 और 2002 के साल भी सूखे के लिहाज से देश के लिए काफी खराब रहे थे।

देश के 13 राज्यों के 316 जिलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सालाना आगमन प्रभावित हुई, जिससे कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ। साथ ही गेहूं निर्यात के फैसले को भी वापस लिया। सरकार ने कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए डीजल सब्सिडी और अतिरिक्त बिजली आपूर्ति की घोषणा की, जिससे खड़ी फसलों को बचाया जा सके।

ये अभी भी सोचने वाली बात है कि आजादी के 60 से भी ज्यादा सालों बाद देश की 60 प्रतिशत खेती बारिश के पानी पर निर्भर है। साथ ही देश में आधुनिक वेयरहाउस या कोल्ड स्टोरेज की काफी कमी है।

अभी सरकार सूखे से निपटने के उपाय सोच ही रही थी कि देश के चार प्रमुख खाद्य उत्पादक राज्यों- आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में देर से हुई बारिश से बाढ़ आ गई। सूखे और बाढ़ के दोहरे प्रभाव से खरीफ (गर्मियों) के खाद्यान्न उत्पादन में 2.1 करोड़ टन की कमी आई। इसकी मुख्य वजह चावल उत्पादन में 1.5 करोड़ टन की कमी थी।

हालांकि केंद्र सरकार ने दावा किया कि उसके पास राशन की दुकानों से बिक्री के लिए 13 महीने का खाद्यान्न  भंडार है, लेकिन इसके बावजूद खाद्य मुद्रास्फीति साल के अंत तक 19.95 प्रतिशत के दस साल के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई। प्याज की कीमतों ने भी लोगों की आंखों से आंसू निकाले, वहीं आलू के दाम भी ऊंचाई पर पहुंच गए। 40 रूपए प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंची चीनी की मिठास भी फीकी पड़ गई।

संप्रग सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून जैसे वादों के बाद सत्ता में लौटी थी। बढ़ती कीमतों के कारण सरकार को कई बार विपक्षी दलों के हमलों का सामना करना पड़ा।
     
अगर सालाना आधार पर देखा जाए, तो आलू के दाम 136 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि दालें 40 फीसदी महंगी हुई। प्याज 15.4 प्रतिशत चढ़ा है। अन्य खाद्य वस्तुओं में गेहूं 14 प्रतिशत, दूध 13.6 प्रतिशत, चावल 12.7 प्रतिशत और फल 11 प्रतिशत महंगे हुए।

केंद्र ने कई बार कीमतों का दोष राज्य सरकारों पर डालते हुए कहा कि वे कालाबाजारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में असफल रहे हैं। साथ ही सरकार ने तर्क दिया कि पिछले पांच साल के दौरान गेहूं और चावल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में काफी बढ़ोतरी हुई है, जिसका खुदरा कीमतों पर असर पड़ा है।

इस साल भी धान की सामान्य किस्म का न्यूनतम समर्थन मूल्य 100 रूपए बढ़ाकर 1,000 रूपए प्रति क्विंटल किया गया है। इन सबके बीच सरकार ने चावल और चीनी पर आयात शुल्क खत्म कर दिया। साथ ही चीनी के वायदा कारोबार पर भी रोक लगा दी गई। सरकार ने कीमतों पर नियंत्रण के लिए चावल और चीनी को खुले बाजार में जारी करने का फैसला किया।
     
हालांकि इन सब नकारात्मक चीजों के बीच खाद्य तेल की कीमतें उचित स्तर पर बनी रहीं। शून्य आयात शुल्क के दौर के बीच 2008-09 के अक्टूबर में समाप्त हुए सीजन में वनस्पति तेलों का आयात 86 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

गेहूं, चावल और चीनी के अलावा सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिए आयातित खाद्य तेल और दालों की बिक्री भी शुरू की, जिससे खाद्य सब्सिडी में काफी बढ़ोतरी हुई। चालू वित्त वर्ष में खाद्य सब्सिडी के 60,000 करोड़ रुपये के पार जाने की संभावना है। 2004-05 में यह 19,000 करोड़ रुपये रही थी।

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