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नए राज्य : और बँटवारा मत करो

नए राज्य : और बँटवारा मत करो

सब उत्तर प्रदेश के बँटवारे की बात कर रहे हैं। पर मेरा मानना है कि प्रदेश को टुकड़ों में बाँटने से झगड़े बढ़ेंगे। अब इसे और बाँटने से कोई भला नहीं होने वाला। बड़ी मुश्किल से इस देश में रियासतें खत्म हुई हैं। अब क्या दोबारा छोटी-छोटी रियासतें बनानी हैं? हरित और काले प्रदेश की बात करने वालों की छोड़िए। ऐसा कीजिए, बाइस जिलों की पंचायत बुला लीजिए। उसमें जो फैसला हो उसे मान लिया जाए। पंचायत की बात पर मैं इसलिए जोर दे रहा हूँ क्योंकि हम पंचायत के आदमी हैं, हमने जो कुछ भी किया है वो पंचायत के फैसले से ही किया है। बिना पंचायत के कुछ नहीं किया है। अकेले अजित और मायावती के चाहने से सब कुछ थोड़े ही हो जाएगा!

एक घर, एक जाई का हो, तो बड़े मौज की बात है। बँटवारा न हो, सब एक जगह रहें, तो इससे अच्छा कुछ नहीं है। बड़ा परिवार हो जाने पर समस्याएँ आने लगती हैं। प्रदेश बड़ा है। इस कारण यदि कोई समस्या आ रही हो तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कुछ हिस्सा दिल्ली में मिला दीजिए और कुछ उत्तराखंड में। जो बचे, वो हरियाणा में कर दीजिए। यह भी तब हो, जब बहुत ज्यादा जरूरी हो। अगर हम दिल्ली में आ गए तो बहुत सारी सुविधाएँ मिल जाएँगी। मेट्रो हमारे जिलों तक आ जाएगी। नौजवानों को रोजगार मिलेगा। रही समस्या हाईकोर्ट की तो वह भी अपने आप हल हो जाएगी। दिल्ली में कानून व्यवस्था बहुत अच्छी है। सिपाही की डय़ूटी आठ घंटे की होती है। यहाँ भी यही व्यवस्था लागू हो जाएगी और अपराध भी रुक जाएँगे।

बँटवारे की माँग उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा उठती है। सब कहते हैं बड़ा है प्रदेश। इससे बड़ा क्षेत्रफल तो राजस्थान का है। वहाँ तो किसी ने बँटवारे की माँग नहीं की। हमारा प्रदेश काफी बड़ा है तो क्या हुआ, इसमें एक स्वाभिमान भी तो छिपा है। टुकड़े हो गए तो हमारा वह स्वाभिमान नहीं रहेगा। अभी हम सबके सामने गर्व से यह कह सकते हैं कि हमारे प्रदेश की जनसंख्या पाकिस्तान से ज्यादा है। टुकड़े हो गए तो हम भी छोटे से प्रदेश की श्रेणी में आ जाएँगे।

अगर इस प्रदेश के कई प्रदेश बने तो झगड़े ही झगड़े हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ही लीजिए। कुछ लोग तो राजधानी पर ही झगड़ पड़ेंगे। यहीं से झगड़े की शुरुआत हो जाएगी। बिजनौर और सहारनपुर के लोग कह रहे हैं हमें उत्तराखंड में मिला दो। गाजियाबाद, नोएडा, मुजफ्फरनगर, मेरठ के लोग कह रहे हैं दिल्ली में मिला दो। पहले तो इन 22 जिलों में ही एका नहीं है। जब सबकी राय अलग-अलग है तो यह हरित प्रदेश कैसा?

जब तक रोटी एक चूल्हे पर बन रही है तब तक ही ठीक है। चूल्हे का बँटवारा हो जाएगा तो बेरवा बिरान ही है। गाँव में ही देख लीजिए। जिसका साझा चूल्हा उसी का पूरे गाँव पे राज। उनकी आमदनी भी ज्यादा होती है। जिनके घर जमीन बँट जाती है उन्हें गाँव में भी कोई कुछ नहीं समझता। गाँव में भी उसी का राज चलता है जिसका घर इकट्ठा है। जिनके भाई बँट जाते हैं, वे भाई बिखर भी जाते हैं।

हमने तो 16 से 18 जनवरी तक इलाहाबाद में महापंचायत बुला रखी है। पूरे प्रदेश के लोग इस पंचायत में आएँगे। उन सबसे अलग-अलग पूछेंगे कि क्या वह प्रदेश का बँटवारा चाहते हैं? यदि सब लोग बँटवारे को राजी हो गए तो बँटवारे की बात करेंगे और अगर यह फैसला हो गया कि प्रदेश का बँटवारा नहीं होना चाहिए तो हमारी लड़ाई यही होगी कि पूरा प्रदेश एक ही रहे।
 
चाहे मायावती बुंदेलखंड की बात करें और अजित सिंह हरित प्रदेश की, किसी एक आदमी के चाहने से कुछ होने वाला नहीं है। असली बात तो जनता के दिल की है। यह देख लेना चाहिए कि जनता का दिल क्या कह रहा है? लोकतंत्र है, अकेले के कहने से कुछ नहीं होगा। जो भी निर्णय हो, जनता की नब्ज देखकर हो। अब पूर्वाचल की ही बात लीजिए, यदि भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाना है तो भोजपुरी तो बिहार के एक बड़े हिस्से के लोग बोलते हैं और पूर्वाचल के लोग भी। फिर तो इन सबको एक साथ मिला देना चाहिए। हमारे लिए तो जैसा मुजफ्फरनगर है वैसा ही बस्ती और लखनऊ भी। हमारे लिए प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के किसान एक जैसे हैं। बँटवारा न होने से एक अपनापन रहता है। यदि बँटवारा हो गया तो यह अपनापन भी जाता रहेगा।

लेखक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता हैं

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