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सच के 'तारे जमींन पर' हैं ये बच्चे

ये बच्चे पढ़ते हैं, लिखते हैं, खेलते हैं, खाना बनाते हैं, मेहमानों का स्वागत भी करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं और हर तरह के कामों के साथ आपकी सिर्फ एक मुस्कान पर आपके चारों ओर खिलखिलाहट बिखेर देते हैं। यह स्पेशल (विकलांग) बच्चे प्रकृति के कोप को जरूर झेल रहे हैं लेकिन जिंदगी को पूरी तरह से जी रहे हैं।

टीचर के इशारों पर कैलेंडर, ज्वेलरी बॉक्स, शो पीस, बैग और कई चीजें बनाकर अपनी जीविका का भी इंतजाम कर रहे हैं। सेक्टर-132 स्थित माता भगवती चड्ढा निकेतन की प्राचार्या वंदना ने बताया कि इन बच्चों के हाथों से बनाई गई चीजों को हम शहर में कई जगहों पर कियोस्क लगाकर बेचते हैं और इनसे आने वाले पैसों को हम इन्हें ही दे देते हैं।

जमीं के नन्हे तारे कहलाने वाले ये बच्चों यहां सिर्फ सुधरकर पढ़ाई तक ही सीमित नहीं रहते। बल्कि इनमें से कई ऐसे भी है जिन्होंने विकलांगता को चेतावनी देते हुए अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी है। ऐसे बच्चों में से एक हैं राहुल शुक्ला, इन्होंने बांग्लादेश में क्रिकेट में लोगों को अपना लोहा मनवाया। वहीं जयंती की पेंटिंग्स को देखने दूर-दराज से लोग आते हैं। वहीं संस्था के दो बच्चे क्रिकेट खेलने के लिए आस्ट्रेलिया तक जा चुके हैं। सोलह साल की जीनत, फैशन डिजाइनिंग में रोहित बल को भी मात देने के लिए तैयारी कर रही हैं।

प्राचार्या वंदना का कहना है, ‘यहां आने वाले बच्चों में से कई तो बड़े परिवारों से होते हैं लेकिन कई निम्न परिवारों से भी। संस्था में इन बच्चों का एडमिशन नि:शुल्क है। एडमिशन के दौरान इनका बड़े डॉक्टरों द्वारा चेकअप किया जाता है कि इन्हें किस स्टेज की शिक्षा देनी है। उन्हें पढ़ाना है या शुरुआत व्यवहार में परिवर्तन से करनी है। इसके बाद बच्चों के माता-पिता की भी काउंसलिंग होती है और फिर बच्चों को चिकित्सकीय परामर्श पर एडमिशन दे दिया जाता है। ’

संस्था में दो साल से लेकर पचपन साल तक के बच्चे हैं। लेकिन देखकर शायद ताज्जुब हो कि पचपन साल के होने पर भी इनका मानसिक विकास न हो पाने पर इन्हें बच्चा ही कहते हैं। संस्था की प्रधानाचार्या वंदना कहती हैं कि संस्था में हर साल नए बच्चे आते हैं और कई पुराने कुछ या बहुत हद तक सही होकर चले भी गए। लेकिन हर बच्चे को हमसे और हमें हर बच्चे से एक अलग ही लगाव हो जाता है।
                                                                    

 

 

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