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अंदरूनी कशमकश का गवाह बना सदन

उत्तराखंड विधानसभा के चार दिनी सत्र में सत्ता व विपक्ष को बारम्बार खट्टे मीठे अनुभव से गुजरना पड़ा। विपक्ष के हंगामे से सदन की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। विधानसभाध्यक्ष हरबंस कपूर पूरी तरह कड़क मास्टर की भूमिका में दिखे। कपूर  पक्ष-विपक्ष को बेहतर आचरण की नसीहत देने से नहीं चूके। विधायकों के लिए खास खुशखबरी यह रही कि गंभीर वित्तीय संकट के वावजूद उनकी निधि दो करोड़ होने के साथ वेतन पेशंन भत्तों में भी विशेष बढ़ोत्तरी हुई।

कमोबेश सभी दलों में कई बार अंदरूनी कश्मकश का मंजर भी नजर आया। मंत्री घिरे तो कुछ विधायक पार्टी लाइन से भी हटे। लाठीचार्ज के मुद्दे पर सड़क व सदन में हुए हंगामे के बाद सरकार को नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत के आमरण अनशन से जूझना पड़ा।

सदन के इतिहास के सबसे लंबे स्थगन के बाद दो पुलिस अधिकारियों को अटैच करना पड़ा। इस मुद्दे पर विपक्ष  के दबाव के बाद स्वंय मुख्यमंत्री डा. निशंक का सदन में आना पड़ा।  इस प्रकरण के बाद फ्रंटफुट पर दिख रही कांग्रेस को बाद में अपनी ही विधायकों के यू टर्न से दो चार होना पड़ा।

बुधवार को भोजनावकाश के बाद कुछ कांग्रेसी विधायकों ने वेल में धरना देकर अपने ही विधानमंडल दल के नेता के समक्ष मुश्किलें खड़ी कर दी। बसपा में भी टूट के साफ लक्षण नजर आए। बसपा विधायक काजी निजामुद्दीन ने एक बार फिर खुले तौर पर कांग्रेस के मुद्दों का समर्थन किया।

एक बार तो काजी कांग्रेस विधायक के साथ वेल में धरने पर भी बैठे। गुरुवार को भाजपा विधायक सुरेश जैन कुंभ के मुद्दे पर अपने ही मंत्री मदन कौशिक से सवाल जवाब करते नजर आए। उधर, सरकार में सहयोगी उक्रांद के विधायक ओमगोपाल ने भी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाया।

सत्र में भाजपा मंत्रियों के होमवर्क की पोल एक बार फिर खुली। इस बार भी खाद्य मंत्री दिवाकर भट्ट विपक्ष का मुकाबला नहीं कर पाए। कांग्रेस व बसपा विधायक मंत्री मदन कौशिक, कंडारी व त्रिवेन्द्र रावत को हरदम अपने जाल में फंसाने की कोशिश में रहा। अधिकतर समय संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ही विपक्षी धार को कुंद करते देखे गए।

खराब वित्तीय स्थिति पर मुख्यमंत्री डा. निशंक ने विपक्ष के आरोपों का सधे अंदाज में जवाब दिया। विपक्ष के हंगामे के बीच सत्तारूढ़ दल अनुपूरक बजट के अलावा विधेयक पारित कराने में सफल रहा। अलबत्ता आखिरी दिन मंत्री पुत्र के सदन में प्रवेश से सरकार को बिन बुलाए संकट से निपटना पड़ा।

सुरक्षा में चूक से विपक्ष को भड़कने का पूरा मौका मिला। स्थाई राजधानी गैरसैंण पर पुष्पेश त्रिपाठी के संकल्प पर चर्चा अगले सत्र तक टलने से भाजपा व कांग्रेस ने राहत की सांस ली। बिजनौर के गांवों को प्रदेश में शामिल कराने के मुद्दे पर उक्रांद ने कड़े तेवर दिखाए। अब आगामी बजट सत्र में ही सत्ता व विपक्ष के बीच एक नया संघर्ष देखने को मिलेगा।

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