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फ्रंट पर आए युवा बुजुर्ग बैकफुट पर

देश की राजनीति में वर्ष 2009 को इस बात के लिए खास तौर पर याद किया जाएगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो बात जनता को राष्ट्रीय हित के विपरीत नजर आई, उसके खिलाफ उसने मौका मिलते ही अपना फैसला सुनाया। राजनीति में स्वार्थपूर्ण जोड़-तोड़, मौकापरस्ती और नकारात्मक बूढ़ी राजनीति की जगह नई पीढ़ी को आगे आकर काम करने का मौका देने में रुचि दिखाई।

वर्ष 2009 में केंद्रीय सत्ता में यूपीए की दोबारा जोरदार वापसी को सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में याद किया जाएगा। नेहरू युग के बाद यह तीसरा मौका था जब डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के साथ और मजबूत होकर लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटी। इस साल देश के मतदाताओं ने दो ध्रुवीय राजनीति की वापसी के साफ संकेत दिए तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों की पकड़ राजनीति में ढीली होती गई।

नई ब्रिगेड तैयार : इस आम चुनाव ने दो संकेत और साफ तौर पर दिए। पहला तो यह कि मौकापरस्त गठबंधन को लोग पसंद नहीं करते, दूसरे बुजुर्गो के मुकाबले युवा शक्ति की राजनीति में सक्रियता बढ़ाने के प्रयासों पर जनता ने अपनी स्वीकृति की मोहर लगाई। इसमें शक नहीं कि सबसे ज्यादा जनता के इस रुझान को कांग्रेस ने ही तवज्जो दी।

राहुल की मुहिम : बतौर बहस सामने आई युवा राजनीति ने न सिर्फ कांग्रेस के भीतर और बाहर अपना असर दिखाया बल्कि अन्य पार्टियों में भी इसका छुट-पुट असर दिखाई दिया। कांग्रेस ने तो राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता के मद्देनजर राहुल को देशव्यापी दौरों के जरिए नए अवतार के रूप में पेश किया। राहुल ने भी हर कहीं अपनी बात सहज भाव से रखी। उन्होंने युवा छात्रों के बीच जाने के कार्यक्रम खास अभियान की तरह चलाए। इसमें उनकी युवा ब्रिगेड के दूसरे साथी भी सक्रिय दिखे। यही नहीं, राहुल ने देश के विभिन्न भागों में दलित-आदिवासियों के बीच जाकर जिस तरह से नई पीढ़ी के हाथों में सत्ता की चाबी देने का आह्वान किया उससे लोग काफी प्रभावित होते भी नजर आए।

भाजपा में उठापठक
बदलती राजनीतिक तसवीर की चिंता भाजपा में भी महसूस की गई और बदलाव की स्थिति को भांपते हुए इस साल देश के दूसरे बड़े राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी में भी असंतोष और फूट के हालात बनते देख संघ परिवार सक्रिय हुआ और पार्टी की छवि और भविष्य को लेकर भाजपा में भी बड़े परिवर्तन देखने को मिले। पहले तो राजनाथ सिंह और आडवाणी के नेतृत्व पर कई तरफ से अंतरप्रहार हुए, उसके बाद 2013 में पार्टी के लिए अनुकूल आधारभूमि बनाने की खातिर भाजपा की कायापलट के फैसले अमल में लाए गए। पहले तो सुषमा स्वराज को सदन में पार्टी नेता बनाने की बात हुई और बिना वक्त गंवाए पार्टी के नेतृत्व के लिए राज्य की राजनीति से उठाकर 52 वर्षीय नितिन गडकरी को भाजपा के नेतृत्व की कमान सौंप दी गई। और लगातार हार के लिए जिम्मेदार राजनाथ सिंह को हाशिये पर ला दिया गया।

क्षेत्रीय दलों का कम होता प्रभाव : समझा तो यही जा रहा है कि आने वाले दौर की राजनीति इन्हीं दो ध्रुवों पर केंद्रित रहेगी। इसे राजनीतिक हताशा की विडंबना कहें या वक्त की नजाकत समझें पर इस बात की पुष्टि पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में भी होती दिखी कि जनता के सामने अभी कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं है।

विधानसभा चुनाव : आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में ये देखने में आया कि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कमजोर हुआ है। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र में हुए चुनावों में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रहा। आंध्रप्रदेश में जहां कांग्रेस ने 156 सीटें जीती, वहीं अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस ने 42 सीटों पर जीत दर्ज की।

भाषा पर हताशा : अपना मराठा कार्ड असफल होते देख राज ठाकरे ने महाराष्ट्र के विधायकों को हिन्दी में शपथ लेने के खिलाफ भी चेताया। इस ‘आदेश’ का उल्लंघन किया समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी ने, जिसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा में हुए हंगामे के दृश्य देश की जनता ने देखे।

इसी तरह नफरत फैलाने की जिस राजनीति को वरुण गांधी के जरिए उभारने की कोशिश हुई थी उसे भी लोगों ने ज्यादा भाव नहीं दिए बल्कि इससे भाजपा को भी राजनीतिक नुकसान ही उठाना पड़ा और वरुण गांधी को भी जेल की हवा खानी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस शर्त पर उन्हें रिहा किया कि वे भविष्य में कोई भड़काऊ बयानबाजी नहीं करेंगे। कांग्रेस को भी सिख विरोधी दंगों में कथित भूमिका के कारण सिखों की नाराजगी को देखते हुए जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को चुनाव मैदान से हटाना पड़ा था और इसका उसे राजनीतिक लाभ भी मिला।

हाय महंगाई : सत्ता संभालने के बाद यूपीए सरकार जिस मोर्चे पर बुरी तरह विफल रही है, वह आम जनता के लिए सबसे ज्यादा असंतोष और चिंता कारण है। पूरे साल लोग बढ़ती महंगाई से त्रस्त होते रहे। कभी मंदी तो कभी मौसमी मार से उत्पादन में कमी के बहाने गिनवाए गए। दूसरी तरफ विपक्ष ने जनता को यह जताने की कोशिश पूरी तन्मयता से की कि वायदा कारोबार की वजह से ज्यादा महंगाई बढ़ी है। पर कुल मिलाकर सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद महंगाई पर लगाम लगाने के मामले में तो असफल ही रही। कहने को जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ मुहिम भी चली और आम उपभोक्ता वस्तुएं राशन की दुकानों पर उपलब्ध कराने के दावे भी हुए पर गरीबों की दाल-रोटी पर सरकार की पहल जमीनी स्तर पर कहीं रंग लाती नहीं दिखी।

नक्सली चुनौती : इस वर्ष सरकार की दूसरी बड़ी विफलता नक्सलवाद से मोर्चा लेने के मामले में सामने आई और इन घटनाओं को रोकने में सरकार को कारगर ढंग से कामयाबी नहीं मिल पाई। सशस्त्र नक्सलियों ने बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में हिंसक वारदातें कीं और लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया तक को बाधित करने की कोशिश की।

बाय-बाय मंदी : वैश्विक मंदी के दुष्प्रभावों से देश को बचाने की कोशिश जरूर इस मायने में सफल मानी जा सकती है कि वर्षात आते-आते इस मामले में सुखांत संकेत नजर आने लगे हैं और कारोबार विस्तार और नई नौकरियों  की संभावनाएं बढ़ती दिखने लगी हैं।

कितने करोड़पति : ज्यादा करोड़पतियों की भारतीय राजनीति में सक्रियता के लिए भी याद किया जाएगा यह साल। देश और दुनिया बेशक इधर मंदी से उबरी हो, लेकिन राजनेताओं की जेबें कुछ इस कदर भरी दिखीं कि आमचुनावों से पहले स्वयं देश की जनता और चुनाव आयोग भी हैरान दिखा। प्रत्याशी चाहे चुनाव जीते हों या हारे हों, उनकी संपत्तियों के खुलासे से सभी दांतों तले उंगली दबा गए। एक रिकार्ड यह भी बना कि आमचुनाव जीतने के बाद आज तक सबसे अधिक संख्या में करोड़पति संसद में पहुंचे। वैसे हारने वाले भी कुछ कम नहीं रहे। दिल्ली के ही एक हारने वाले प्रत्याशी की संपत्ति छह सौ करोड़ रुपए से ऊपर की थी।

लिब्रहान आयोग पर बहस : 1992 के बाबरी विध्वंस पर जस्टिस लिब्रहान की रिपोर्ट के बाद देश भर में एक बार फिर राजनीतिक ध्रुवीकरण का डर जोर पकड़ने लगा था। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के 17 वर्ष बाद जारी इस रिपोर्ट पर देश की संसद में भी गर्मागर्म बहस सामने आई। विपक्ष यानी भाजपा और उसके साथी दलों ने रिपोर्ट को राजनीतिक भावनाओं से प्रेरित बताया और इस पर सत्तासीन कांग्रेस का जमकर विरोध किया। विपक्षी नेता सुषमा स्वराज ने तो संसद में अध्यक्ष के सामने रिपोर्ट को ‘खुदा के लिए’ खारिज करने तक की मांग रख दी थी। कहना न होगा कि रिपोर्ट में भाजपा और संघ परिवार के शीर्ष नेताओं का नाम आने से भाजपा की चिंता लाजिमी थी, वहीं राजनीतिक ध्रुवीकरण की शंका कांग्रेस को भी सताने लगी थी। लिहाजा, रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाला गया और एक बार फिर बाबरी विध्वंस की छाया देश के राजनीतिक माहौल पर छाई और छंट गई।

तेलंगाना और उसके बहाने : आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर क्रेश में मृत्यु के कुछ ही समय बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के सर्वेसर्वा के. चंद्रशेखर राव ने अलग तेलंगाना राज्य बनाने के मुद्दे को गर्मा दिया। चंद्रशेखर राव स्वयं भूख हड़ताल पर बैठे और उनके समर्थक, जिनमें बड़ी संख्या में उस्मानिया यूनिवर्सिटी के छात्र भी शामिल थे, ने कई स्थानों पर खासा बवाल मचाया और राज्य में हैदराबाद सहित कई स्थानों पर जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

हालात कुछ इस कदर बेकाबू हुए कि केंद्र सरकार को राव की मांग के आगे झुककर तेलंगाना राज्य की मांग माननी पड़ी। लेकिन इसके फौरन बाद तेलंगाना का विरोध बड़ी संख्या में शुरू हो गया जिसके अंतर्गत राज्य में कांग्रेस के विधायकों ने इस्तीफा देना शुरू किया और सांसद भी इसमें पीछे नहीं रहे। उधर अन्य नए राज्यों के निर्माण की भी मांग एक स्वर में उठीं जिनमें सबसे बड़ी थी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की आवाज जिन्होंने राज्य के तीन टुकड़ों की सिफारिश करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। बहरहाल, एक ओर जहां केंद्र सरकार की तेलंगाना के मसले पर ‘हां-ना’ जारी है, वहीं दूसरी ओर आंध्रप्रदेश में तेलंगाना निर्माण को लेकर विरोध प्रदर्शन भी।

 

 

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