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जाति की डोर थाम जनाधार बढ़ाने में जुटा संघ

भाजपा में अपनी पसंद को जगह दिलाने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब उसके लिए नई जमीन बनाने में जुट गया है। जनाधार बढ़ाने के लिए संगठन ने जाति की डोर भी थाम ली है। अब इसी के सहारे गांवों में घुसने की तैयारी है।

फिर शुरू होगी जाति तोड़ने की बात। पहले ‘भात-पानी’ फिर ‘बेटी-रोटी’ का संबंध। इसी फामरूले पर संवाद से विवादों का हल निकालने की कोशिश होगी। बहाना समाजिक सद्भाव कायम का है लेकिन उद्देश्य है संगठन का विस्तार।

भाजपा के शीर्ष पद पर नीतिन गडकरी के आसीन होने के बाद पहली बार पटना पहुंचे आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने राजनीतिक संगठन को मजबूत करने की पहल शुरू कर दी है। राजगीर में हुए कार्यकारी मंडल की बैठक के फैसलों को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है।

गांव-गांव तक संगठन का विस्तार कर निचले स्तर पर पेंच कसने की तैयारी है। इसके लिए संगठन उदार भी हुआ और अब उसे अन्तरजतीय विवाह से भी परहेज नहीं। संघ प्रमुख ने गुरुवार को जातीय प्रमुखों की बैठक की तो कुछ ऐसा ही संकेत मिला। उन्होंने हर जाति के लोगों को सद्भाव बनाने में मदद करने की बात कही।

ऐसी बैठकें प्रखंड स्तर पर आयोजित कर मिल्लत के संदेश को नीचे तक उतारने का अनुरोध किया। बैठक से निकलने वाले कुशवाहा समाज के प्रह्लाद शर्मा और नरेश कुमार हों या पटवा समाज के प्रेम नारायण पटवा सबकी बातों का सार यही था कि संघ ने जाति तोड़ने के लिए जातीय प्रमुखों का सहारा लिया है।

प्रखंड स्तर पर आरएसस के बैनर तले बैठकें होंगी और जातीय तनाव दूर करने के लिए भोज का आयोजन होगा। मंदिरों में प्रवेश किसी के लिए वजिर्त नहीं होगा। ऊंच-नीच का भेद भूल सभी एक पंगत पर भोजन करेंगे।

संबंध को आगे बढ़ाने के लिए अंतरजातीय विवाहों को भी बढ़ावा दिया जाएगा। हालांकि बैठक से निकलने के बाद भाजपा नेता संजय पासवान ने कहा कि जातिवाद व्यर्थ है लेकिन जाति तो यथार्थ है।

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