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दो टूक (24 दिसंबर, 2009)

बच्चों का अक्षर ज्ञान अगर आईआईटी से महंगा हो तो इस उलटबांसी को कोई कैसे समझे? यह उस देश की सच्चाई है जहां आधे से ज्यादा बच्चों को स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं।

प्राइवेट स्कूलों द्वारा की जा रही यह अंधेरगर्दी दरअसल शिक्षा को व्यापार बना देने की सरकारी नीति का स्वाभाविक नतीजा है। ऐसे में सबको शिक्षा के सुनहरे सपनों का हश्र क्या होगा, आप स्वयं विचार कीजिए!

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