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नए राज्य बनें, पर इसकी राजनीति न हो

देश के विभिन्न हिस्सों में छोटे राज्यों की मांग बहुत पुरानी है। नए राज्यों के गठन के लिए यह तर्क दिया जाता है कि छोटे राज्यों में विकास तेज गति से होता है। पर अभी तक का यह तजुर्बा रहा है कि कुछ राज्यों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, जबकि कुछ राज्य उम्मीदों पर उतने खरे नहीं उतर पाए, जितनी उनसे उम्मीद की जा रही थी। मसलन, झारखंड और छत्तीसगढ़ तेजी से विकास नहीं कर पाए, जबकि हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब ने तेजी के साथ विकास के नए पैमाने तय किए।

इससे यह बात साबित होती है कि छोटे राज्य के गठन के बाद विकास तेज होना अनिवार्य नहीं है। दोनों तरह के उदाहरण हमारे सामने हैं। देखना यह चाहिए कि राज्य के विभाजन के बाद विकास की गति तेज हो। तेलंगाना की तरह किसी विवाद का जन्म नहीं होना चाहिए। छोटे राज्यों को लेकर जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है, इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। आंध्र प्रदेश पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया है। एक तबका विरोध कर रहा है तो उसका तेलंगाना का समर्थन कर रहा है।

संसद में भी इस पर हंगामा हुआ। लोकसभा की कार्रवाई तीन दिन पहले अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करनी पड़ी। तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) कुछ दिन पहले तक तेलंगाना का विरोध कर रही थी। आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में उसने इसका समर्थन किया। पर जब केंद्र ने प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान किया तो टीडीपी ने फिर संयुक्त आंध्र प्रदेश की बात शुरू कर दी। भाजपा मुख्य विपक्षी दल है। अफसोस की बात यह है कि छोटे राज्य जैसे संवेदनशील मामलों में उसकी राय बहुत स्पष्ट नहीं है। पूर्व की एनडीए सरकार को टीडीपी समर्थन देती रही है। ऐसे में तेलंगाना के मुद्दे पर उसने वही रुख अपनाया, जो टीडीपी का था।

शुरुआत में टीडीपी के साथ भाजपा भी तेलंगाना का विरोध कर रही थी। पर जब राजनीतिक हितों के लिए टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू ने तेलंगाना का समर्थन किया तो भाजपा भी तैयार हो गई, जबकि कांग्रेस का रुख हमेशा स्थिर रहा है। हम हमेशा सर्वसम्मति की बात करते रहे हैं। तेलंगाना राष्ट्र समिति यूपीए-एक की घटक रही है। उस वक्त केंद्र सरकार के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी ने आम सहमति बनाने के लिए समिति का गठन भी किया था। पर उस वक्त कई राजनीतिक दल तैयार नहीं थे। तेलंगाना पर आम सहमति टीआरएस अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव के अनशन के बाद बनती हुई दिखाई दी। इसलिए, फौरन केंद्र ने ऐलान कर दिया।

नए राज्य के गठन की एक तय प्रक्रिया है। इसके लिए उस प्रदेश की विधानसभा से कोई प्रस्ताव पारित होकर केंद्र सरकार के पास आना चाहिए। यदि नए राज्य में एक से अधिक प्रदेशों का हिस्सा शामिल है, तो उन विधानसभाओं से भी प्रस्ताव आने चाहिए।

उसके बाद केंद्र सरकार प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करती है। जहां तक तेलंगाना के गठन का मुद्दा है, आंध्र प्रदेश विधानसभा के प्रस्ताव पर भारत सरकार अनिवार्य रूप से विचार करेगी। इससे पूर्व भी कई राज्यों के निर्माण में यह प्रक्रिया अपनाई गई है। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम और उनके बाद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यही कहा है कि विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया जाएगा। सरकार प्रक्रिया को पूरा करना चाहती है। मु्श्किल यह है कि राज्यों के विभाजन को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। सभी अपनी सियासत चमकाना चाहते हैं। यह हमारे राष्ट्र के संविधान की भावनाओं के अनुरूप नहीं है।

उत्तर प्रदेश का उदाहरण लीजिए। मुख्यमंत्री मायावती ने एक दिन दो और एक दिन तीन राज्य बनाने की मांग कर डाली। उन्होंने इसके लिए केंद्र सरकार को पत्र भी लिख दिए। यह ठीक नहीं है क्योंकि असलियत इससे अलग बिल्कुल अलग है। मुख्यमंत्री से इस तरह का व्यवहार करने की उम्मीद नहीं की जाती। कांग्रेस छोटे राज्यों के खिलाफ नहीं है। पूर्व की कांग्रेस सरकार के वक्त कई राज्यों का गठन हुआ। पर इसके लिए कुछ मापदंड और पैमाने होने चाहिए। सबसे पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि इस तरह का विभाजन आम सहमति के आधार पर होना चाहिए। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ सभी राज्यों का विभाजन आम सहमित के आधार पर हुआ। इन प्रदेशों की हकीकत हम सभी के सामने है।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने राज्य को विकास का आधार दिया। इसलिए, उत्तराखंड ने अपने साथ बने दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा तरक्की की है। मैं यह सब उदाहरण इसलिए दे रहा हूं ताकि यह साफ हो जाए कि सिर्फ छोटे राज्यों के गठन से विकास की गति तेज होना कोई शर्त नहीं है। कई प्रदेशों के गठन में यह प्रयोग बहुत कामयाब नहीं रहा है। झारखंड की राजनीतिक अस्थिरता हम सभी के सामने है।

अब उत्तर प्रदेश की बात करते हैं। जैसा मैनें पहले कहा कि मुख्यमंत्री मायावती की छोटे राज्यों के गठन की कोई मंशा नहीं है। वह सिर्फ क्षेत्रीय भावनाओं के जरिए राजनीतिक फायदा लेना चाहती है। वरना क्या वजह थी कि पहले पत्र में पूर्वाचल और दूसरे पत्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड का जिक्र नहीं था। यह प्रदेश के पुर्नगठन के बारे में उनके नजरिए और गंभीरता को दर्शाता है। देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें इस तरह के संवेदनशील मामलों में गंभीरता से पेश आना चाहिए।

अब बुंदेलखंड पर आते हैं। बुंदेलखंड का इलाका काफी पिछड़ा हुआ है। विकास की गति बहुत धीमी है। नए प्रदेश के गठन की एक लंबी प्रक्रिया है। इसलिए कांग्रेस ने बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण बनाने का सुझाव दिया था।
अफसोस की बात यह है कि अलग राज्य बनाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखने वाली मुख्यमंत्री को प्राधिकरण बनाए जाने पर एतराज था। केंद्र सरकार की कोशिश सिर्फ इतनी थी कि बुंदेलखंड में विकास कार्यो के लिए जो धन दिया जाए वह प्राधिकरण की देखरेख में खर्च हो। पर उप्र और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह मंजूर नहीं था।

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री अगर वाकई बुंदेलखंड का विकास चाहती थी, तो उन्हें उस वक्त इस प्रस्ताव का विरोध नहीं करना चाहिए था। चूंकि, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी इसका समर्थन कर चुके थे,  शायद इसीलिए उन्होंने इसका विरोध किया। यह छोटे राज्यों के गठन को लेकर राजनीति नहीं है, तो और क्या है।

लेखक केंद्रीय कोयला राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं।

(प्रस्तुति- सुहेल हामिद)

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