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हिम्मत के सहयात्री

चौदह साल की रुचिका गिरहोत्र के साथ छेड़खानी के आरोप में हरियाणा पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपीएम राठौर को सजा मिलना एक राहत की बात है। इस प्रसंग में दो तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। पहला यह कि राठौर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए मामले को रफा-दफा करने और रुचिका के परिवार को प्रताड़ित करने की भरपूर कोशिश की। अगर हमारा तंत्र कुछ ज्यादा न्यायप्रिय और संवेदनशील होता तो रुचिका के परिवार को इतनी जलालत न झेलनी पड़ती और रुचिका को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती। अगर उन्नीस साल बाद राठौर को सजा मिली है तो वह सिर्फ उसकी सहेली आराधना और उसके माता-पिता मधु और आनंद प्रकाश की हिम्मत और संवेदनशीलता की वजह से है।

रुचिका को न्याय दिलाने की कोशिश करने में इस परिवार को कोई कम तकलीफें नहीं ङोलनी पड़ीं, लेकिन इस सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार ने बेटी की सहेली की खातिर वह सब किया, जो अपने परिवार के लिए करने में भी लोग डर जाते हैं। लगातार प्रताड़नाओं और तकलीफों से रुचिका के परिवार का अपने आप में सिमट जाना समझा जा सकता है, लेकिन प्रकाश परिवार के साहस के सामने सिर्फ सम्मान से सिर झुकाया जा सकता है। 

हम यह जानते हैं और देखते भी हैं कि समाज में अक्सर लोग किसी की मदद के लिए नहीं सामने आते। यह शिकायत भी अक्सर सुनी जाती है कि लोग इतने स्वार्थी और संवेदनहीन हो गए हैं कि पड़ोसी, पड़ोसी की मदद नहीं करता। लेकिन यह परिवार मनुष्यता की एक दूसरी और उजली तस्वीर सामने लाता है जहां वे एक पराई लड़की के लिए सोलह साल से एक व्यवस्था की निरंकुश ताकत से लड़ते रहे। आराधना शादी कर के ऑस्ट्रेलिया चली गई लेकिन वहां से भी अपना बयान दर्ज करवाने भारत आई, और राठौर को सजा दिलवाने में सबसे बड़ी भूमिका उसके बयान की ही थी।

इस तरह के लोग मनुष्यता में उम्मीद बनाए रखते हैं और किसी समाज के असली नायक ये लोग होते हैं, जिन्हें न करोड़ों रुपया, न ग्लैमर, न करोड़ों फैन्स का प्यार मिलता है लेकिन जो चुपचाप एक क्रूर व्यवस्था के सामने न्याय की उम्मीद का दीया जलाते हैं और बरसों उस दीये को जलाए रखते हैं। हमें इस परिवार को तो सलाम करना चाहिए, लेकिन क्या हम ऐसी व्यवस्था भी बनाएंगे जिसमें रुचिका को आत्महत्या न करना पड़े और एक वृद्ध दंपती को न्याय के लिए एड़ियां न रगड़नी पड़ें।

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