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अच्छी सेहत से जुड़ी 10 गलतफहमियां

अच्छे स्वास्थ्य को पाने के लिए इंसान क्या क्या नुस्खे नहीं आजमाता है। एक सर्वे के मुताबिक आम आदमी के वार्षिक बजट में औसतन 12 प्रतिशत व्यय सेहत बनाने के नाम पर होता है। लेकिन सेहत के ही नाम पर हमारे बीच तरह तरह के मिथ और भ्रम पनपते रहते हैं। ये कभी हमारी शारीरिक संरचना से जुड़े होते है तो कभी बीमारी के लक्षणों से। हमारे खान-पान को भी ये मिथ कंट्रोल करने लगते हैं। स्थिति तो यह है कि कुछ डाक्टर और नर्स भी इन भ्रमों का शिकार बन जाते हैं।

दुनियाभर में हो रहे शोध हमें लगातार ऐसे भ्रमों को न पालने के लिए सचेत करते रहते हैं। हाल ही में प्रकाशित हुए कुछ अध्ययनों ने फिर हमारा ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है। आइए आप का परिचय कुछ ऐसे ही भ्रमों कराते हैं जो अभी तक हमारे बीच एक विश्वास के तौर पर जड़ जमाए हैं-

1 ठंडा मौसम हमें बीमार बनाता है ?
हम में से बहुत से लोगों का मानना है कि ठंडे मौसम में लोग ज्यादा बीमार पड़ते हैं, जबकि अध्ययन बताते हैं कि ठंडे मौसम में रोग अपेक्षाकृत कम फैलते हैं। दूसरे, ठंडे मौसम या ठंडी चीजों से बीमार लोग कम पड़ते हैं, बनिस्बत अन्य कारकों के। हां, यह हो सकता है कि ठंड के मौसम में लोग अधिकतर बाहर निकलना कम ही पसंद करते हैं और घरों के अंदर ही दुबके रहते हैं, जिसके फलस्वरूप हो सकता है कि वे रोगाणुओं की पकड़ में आ जाएं। पर यह तो किसी अन्य मौसम में भी घट सकता है।

2 हरे रंग का बलगम साइनस की निशानी ?
बलगम के रंग को लेकर तो कुछ डॉक्टरों तक का मानना है कि यह साइनस की पहचान या निशानी है। जबकि आज तक इस बात के पक्ष में ऐसा कोई सबूत या तथ्य पेश नहीं किया जा सका है। यह भी साबित नहीं हो पाया है कि बीमारी के कारण जब एंटीबॉडी कम हो रहे होते हैं तो हरा बलगम उसकी पहचान है।

3 अधिकतर गर्मी सिर से निकलती है  ?
दरअसल, इसमें कुछ भी खास बात नहीं है। शरीर की गर्मी  हमारे शरीर के उन सभी अंगों से बाहर निकलती है जिन्हें हमने कपड़ो आदि से कवर न किया हो।

4 दूध कफ बनाता है ?
तीन सौ मरीजों पर किए एक अध्ययन के अनुसार दो तिहाई मरीजों का मानना था कि दूध पीने के कारण बलगम या कफ बनता है। पर यह बात वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित नहीं हो पाई है। उपरोक्त अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन मरीजों को वायरल बुखार था, उनमें से कुछ ने स्वेच्छापूर्वक काफी मात्र में दूध का सेवन किया। दूध पीने वाले मरीजों में से किसी के शरीर में न कफ बना और न ही इस वजह से कंजेशन (रक्तसंकुलता) हुआ।

5चीनी बच्चों को उत्तेजित करती है ?
अनेक अध्ययन इस बात को सिद्ध कर चुके हैं कि चीनी का सेवन हमारे या बच्चों के व्यवहार पर असर नहीं डालता है। एक अध्ययन में तो बाकायदा पेरेंट्स को बताया गया कि उनके बच्चों चीनी का घोल पिलाया गया है। इसलिए वह अपने बच्चों के व्यवहार में यदि हाइपरनेस या उत्तेजना देखें तो शोधकर्ताओं को सूचित करें। एक तिहाई लोगों ने अपने बच्चों के व्यवहार में बदलाव देखा। बाद में जब इन पेरेंट्स को बताया गया कि बच्चों को शुगर फ्री पेय पिलाया गया था, न कि चीनी का घोल। तो उन्हें समझ आया कि बदलाव की वजह चीनी में नहीं बल्कि कहीं और छिपी है।

6 अंगों को चटखाने से होता है आर्थराइटिस ?
ऐसा माना जाता है कि उंगलियों या शरीर के अन्य अंगों को चटखाने से आर्थराइटिस हो जाता है। आज तक किसी शोध या केस स्टडी में यह बात प्रमाणित हो नहीं सकी है।

7 एंटीबायोटिक के साथ बर्थकंट्रोल पिल न लें ?
बहुत से लोग मानते हैं कि गर्भ निरोधक गोलियां एंटीबायोटिक दवाओं के साथ नहीं लेनी चाहिए क्योंकि साथ लेने पर इनका प्रभाव खत्म हो जाता है। जबकि इस धारणा में भी सच्चाई का जरा सा भी अंश नहीं है। असली बात है कि गर्भ निरोधक गोलियों को नियत समय पर लिया जाना चाहिए तभी वे असरकारक होती हैं।

8 अविवाहितों का यौन जीवन बेहतर ? 
पश्चिम में बहुत से लोगों का मानना है कि शादीशुदा लोगों की बनिस्पत सिंगल्स की भावनात्मक और सैक्स लाइफ ज्यादा बेहतर होती है जबकि शोधों के परिणाम इस धारणा से उलट तस्वीर बनाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार शादीशुदा व्यक्ति के पास उसकी भावनाओं को समझने वाले व्यक्ति हमेशा मौजूद रहता है जबकि अविवाहित जब बिल्कुल अकेले होते हैं तब उन्हें भावनाओं को साझा करने वाले साथी की कमी महसूस होती है जिसका सीधा असर उनकी भावनात्मक और सैक्स लाइफ पर पड़ता है। यही नहीं शादीशुदा लोगों की बनिस्पत सिंगल्स को शारीरिक संतुष्टि का अहसास कम होता है।

9 रोज टॉयलेट न जाना अस्वस्थता की निशानी नहीं ?
यह भी आधा सच है कि रोजाना शौच जाना साफ पेट की निशानी है और अगर आप रोज शौच नहीं जा रहे हैं तो आप को कब्ज या अन्य कोई बीमारी है, पर अध्ययन बताते हैं कि एक व्यक्ति यदि हफ्ते में तीन बार भी शौच जाता है तो उसे स्वस्थ माना जाता है।

10 गाजर से तेज होती हैं आंखें ?
यह सही है कि गाजर में भारी मात्र में विटामिन-ए होता है, जो कि अच्छी आईसाइट (दृष्टि) के लिए आवश्यक पोषक तत्व है। पर इसका यह कतई अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि इससे हमारी आंखों की ताकत बढ़कर एक्स-रे विजन जैसी हो जाएगी। गाजर खाने से आंखों की ताकत के बढ़ने का कोई सीधा रिश्ता तो नहीं है।
सच्चाई यह है कि इस धारणा को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बिट्रिश सरकार ने जर्मनी की सेनाओं को मूर्ख बनाने के लिए प्रसारित किया था। दरअसल, बिट्रिश सरकार नहीं चाहती थी कि जर्मनी की सेना यह जाने कि वे उनके आक्रमण से बचने के लिए राडारों को सीमा क्षेत्र में लगा रहे हैं। इसीलिए उन्होंने प्रचारित किया हम अपने सैनिकों की दृष्टि को ताकतवर बनाने के लिए सीमा-क्षेत्र में गाजर बो रहे हैं क्योंकि गाजर खाने से आंखों की  ताकत बढ़ती है।

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